Do Not Touch My Clothes: रंगीन पोशाकों वाला कैंपेन, जो खूनी तालिबान पर तमाचे जैसा है

Do Not Touch My Clothes: अफगानिस्तान की कई महिलाओं ने सोशल मीडिया पर अपनी पारंपरिक कपड़ों में तस्वीरें शेयर की हैं और तालिबानियों को और उनके विचारों को ललकारा भी है. सख्त लहजे में कहा है- आप हमारे कपड़े तय नहीं कर सकते हैं.

Written by - Akash Singh | Last Updated : Sep 15, 2021, 09:39 AM IST
  • अफगान महिलाओं ने खुद लड़नी शुरू की अपनी लड़ाई
  • सोशल मीडिया पर वायरल है महिलाओं का ये अभियान
Do Not Touch My Clothes: रंगीन पोशाकों वाला कैंपेन, जो खूनी तालिबान पर तमाचे जैसा है

नई दिल्लीः Do Not Touch My Clothes: कोई भी बात करने से पहले इन पंक्तियों पर एक नजर डाल लेनी चाहिए. फिर आगे का कहा खुद-ब-खुद जेहन में जगह बनाता चलेगा. 

'जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए, 
मेरी आवाज में आवाज़ मिलाते रहिए।
नींद आनी है तो तकदीर भी सो जाती है
कोई अब सो न सके गीत वो गाते रहिए।
वक्त के हाथ में पत्थर भी है और फूल भी हैं
चाह फूलों की है तो चोट भी खाते रहिए।
रोती आँखें उन्हें मुमकिन है कि याद आ जायें
हाथ हत्यारों के अश्कों से धुलाते रहिए।'

ये पंक्तियां भारत के कवि गोपालदाल नीरज की हैं. सुनने में सुकून देने वाली ये लाइनें अचानक ध्यान में तब आ गईं जब आंखें टीवी स्क्रीन पर चल रहे तालिबानी क्रूरता को देख रही थीं. अखबार के पन्नों को पलटते हुए, मोबाइल को स्क्राल करते हुए, अपने आसपास हो रही चर्चाओं को महसूस करते हुए गजल के ये शब्द कब इंकलाबी मालूम होने लगे पता ही नहीं चला.

लेकिन इस गजल को पढ़ते सुनते अब मुझे नीरज साहब का अक्स नजर नहीं आता है. याद आती हैं उस मुल्क की महिलाएं जो गोलियों की भयानक आवाज और रूढ़ियों के घातक माहौल में भी कहती हैं कि चरमपंथी गुट हमारी पहचान नहीं तय कर सकता. हमारी संस्कृति स्याह नहीं है. ये रंगों से भरी है. इसमें खूबसूरती है. इसमें कला है और यही हमारी पहचान है."

अफगानिस्तान की महिलाओं की बात
जिन महिलाओं की बात कर रहे हैं वो अफगानिस्तान की हैं. उसी अफगानिस्तान की जहां अब तालिबानियों का कब्जा है. जिनके फरमान महिलाओं को घरों में कैद कर देने को लेकर हैं. वो कहते हैं कि महिलाएं स्कूल नहीं जाएंगी, बाजार में अकेले नहीं निकलेंगी.

अगर निकलेंगी भी तो काले बुर्के में. इसके पीछे उनका तर्क है कि महिलाएं अगर इन रिवाजों को नहीं मानेंगी तो इससे हमारे धर्म को खतरा है और जो धर्म के आड़े आएगा उसकी सजा मौत है.

खुद अपनी लड़ाई लड़ने उतरीं महिलाएं
इस तालिबानी फरमान के बाद लोग अफगानिस्तान की महिलाओं के लिए संवेदना वाले शब्द बयां कर रहे हैं. लेकिन इस छोटे से मुल्क की महिलाओं ने ठान लिया है कि उन्हें शब्दों का, भावनाओं का रहम नहीं चाहिए. उन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ने की कवायद शुरू की है. उनकी ये पहल अब रंग भी लाने लगी है और सोशल मीडिया पर  #DoNotTouchMyClothes और #AfghanistanCulture ट्रेंड करने लगा है.

यही नहीं अफगानिस्तान की कई महिलाओं ने सोशल मीडिया पर अपनी पारंपरिक कपड़ों में तस्वीरें भी शेयर की हैं और तालिबानियों को और उनके विचारों को ललकारा भी है. सख्त लहजे में कहा है- आप हमारे कपड़े तय नहीं कर सकते हैं.

बेहद दिलचस्प है मुहिम
दरअसल, इस पूरी मुहिम की शुरुआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. हुआ यूं कि पिछले हफ्ते पूरे जिस्म को ढंकने वाले काले रंग की अबाया पहनी महिलाओं ने काबुल में तालिबान के समर्थन में एक रैली निकाली. इस रैली में हिस्सा लेने वाली महिलाओं ने कहा कि माडर्न कपड़े पहनने और मेकअप करने वाली अफ़ग़ान महिलाएं देश की मुस्लिम औरतों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं. हम ऐसे कपड़े और अधिकार नहीं चाहते जो विदेशी हों और शरिया कानून से मेल नहीं खाते हों.

तालिबान पर ऐसे साधा निशाना
लेकिन इस रैली के बाद मानों महिलाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. दुनिया भर की अफगान महिलाओं ने इस तालिबानी सोच को अपना जवाब देने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया.

अफगानिस्तान में एक अमेरिकन यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर रहीं डॉक्टर बहार जलाली के शुरू किए गए सोशल मीडिया कैम्पेन में अन्य अफगान महिलाओं ने अपने पारंपरिक परिधानों को सामने लाते हुए तालिबान पर निशाना साधा.

ये है मुहिम की वजह
इन महिलाओं का कहना है कि ये मुहिम इसलिए शुरू की गई है क्योंकि हम बताना चाहते हैं कि अफगानिस्तान की पहचान और उसकी संप्रभुता पर तालिबानियों ने हमला किया है. उन्होंने अपने कई रंगीन, हसीन और जहीन कपड़ो में तस्वीर शेयर करते हुए  कहा कि हम दुनिया को ये बताना चाहते हैं कि मीडिया में तालिबान समर्थक रैली के दौरान जो तस्वीरें आपने देखीं वो हमारी संस्कृति नहीं है. वो हमारी पहचान नहीं है."

काला बुर्का कभी नहीं रहा पहचान
अफगान महिलाएं इतने रंगीन और सलीकेदार कपड़े पहनती हैं. काले रंग का बुर्का कभी भी हमारी पारंपरिक परिधान नहीं रहा है. एक महिला ने अपनी तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि हम सदियों से एक इस्लामिक मुल्क में रहे हैं और हमारी नानी-दादी सलीके से अपने पारंपरिक परिधान पहनती रही हैं.

वे न तो नीली चदरी पहनती थीं और न ही अरबों का काला बुर्का. हमारे पारंपरिक परिधान पांच हज़ार साल की हमारी समृद्ध संस्कृति और इतिहास का प्रतिनिधित्व करती हैं. हर अफ़ग़ान को इस पर गर्व होता है.

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सोशल मीडिया पर हो रहा वायरल
फिलहाल अफगानिस्तान की इन महिलाओं का ये कैंपेन सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. लोग इस पर तरह तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं और समर्थन भी कर रहे हैं. लेकिन ये आवाज इंकलाब ला पाएगी या बर्बरता के शोर में दफ्न हो जाएगी ये तो वक्त की आने वाली करवट ही बताएगी. लेकिन इन महिलाओं का ये साहस हमेशा के लिए याद रखा जाएगा. 

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