Doha Afghan Talks: भारत के बिना नहीं हो सकता समाधान किन्तु भारत को रहना होगा सावधान

अमेरिकी दूत जलमे खलीलजाद सिर्फ कुछ घंटों के लिए भारत आए, यह स्वागतयोग्य घटना है किन्तु उनके इस आवागमन के मूल उद्देश्य से अपरिचित रहना ठीक नहीं.. ..

Doha Afghan Talks: भारत के बिना नहीं हो सकता समाधान किन्तु भारत को रहना होगा सावधान

नई दिल्ली.  अमेरिकी दूत जलमे खलीलजाद को अफगान-समस्या के समाधान की दिशा में अमेरिका द्वारा विशेष रूप से नियुक्त किया गया है जो इस दौरान भारत आकर चले भी गये. किन्तु सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कतर की राजधानी दोहा में खलीलजाद की मध्यस्थता में चल रही अफगान-वार्ता में भारत भी एक अहम हिस्सेदार है.

 

पहले पाकिस्तान फिर भारत आये

कुल मिला कर देखें तो हाल के लगभग दो वर्षों में खलीलजाद की पांच भारत यात्राएं हो चुकी हैं. अब अहम प्रश्न ये है कि आखिर दोहा में चल रही वार्ता के दौरान ख़लीलजाद पहले पाकिस्तान गए फिर भारत आये, क्या ख़ास वजह हो सकती है इसकी? जहां तक पाकिस्तान-यात्रा का प्रश्न है, तो बात ठीक है, तालिबानियों का वास्तविक संचालन पाकिस्तान से ही होता है. जितना प्रभाव पाकिस्तान की सरकार का तालिबान के फैसलों पर हो सकता है, किसी अन्य देश का नहीं हो सकता. ऐसे में भी अमेरिकी दूत का बार-बार भारत आना क्या संकेत देता है? ज़ाहिर है, भारत के बिना अफगान-संकट का समाधान सम्भव नहीं है. 

भारत को बनाना चाहता है मुहरा 

अब तक जो देखा जा रहा था कि कुछ वर्षों पहले तक अफगान समस्या के समाधान में भारत की कोई भूमिका नहीं थी और न ही भारत की कोई जरूरत समझी जा रही थी. किन्तु अब पिछले तीन वर्षों से भारत को इस समस्या के समाधान की दिशा में संभावित स्रोत के रूप में जोड़ा गया है. ध्यान से देखें तो दिखता है कि इसके पीछे अमेरिका के भारत को अपना मुहरा बना कर इस्तेमाल करने की मंशा भी नजर आती है. 

अमेरिका की भारत को फंसाने की सोच 

अमेरिका की सोच ये हो सकती है कि इस समस्या से मुक्ति पा कर भारत को इसमें फंसाया जाये, उसके बाद भारत जाने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और तालिबान जाने. तालिबान की दुर्जनता के मद्देनज़र यदि आवश्यकता हुई तो जैसे अमेरिकी सेनाएं अब तक अफगानिस्तान में रही हैं, अब भारत की सेनाएं इस जिम्मेदारी के लिए अफगानिस्तान पहुंच जाएंगी, ये अक्लमंदी वाला ख़याल अमेरिकी मस्तिष्क में घूम रहा हो सकता है.

अफगान ने पहले भी यही चाहा था 

चालीस साल पहले जब अफगानिस्तान में बबरक कारमल प्रधानमंत्री हुआ करते थे, उस समय उनकी चाहत ये थी कि रूसी फौजों की बजाये भारतीय फौजें अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए नियुक्त की जाएं जो एक तरफ अफगानी मुजाहिदीनों से टक्कर लेंगी, दूसरी तरफ पाकिस्तान के मुक़ाबिल भी मजबूत दीवाल बनेंगी. परन्तु अफगानिस्तान पाकिस्तान और भारत यदि वास्तव में समस्या का समाधान चाहते हैं तो पाकिस्तान और भारत को बराबरी से मिल कर इसमें अपनी भूमिकाएं निभानी होंगी, तभी इस संकट का स्थायी हल निकल सकता है.

भारत को सावधान रहना होगा 

अमेरिक- भारत मैत्री के परिदृश्य में दोहा में हो रहे अफगान संकट समाधान के दौरान भारत को सावधान रह कर अमेरिका के प्रलोभनों से बचना होगा. ट्रम्प भारत को मीठी-मीठी बातें करके इस मामले में गहरा फंसा न ले, इसके लिए सावधान रहना होगा. भारत के विदेश मंत्रालय की भूमिका सबसे अहम है और उसे एक तरफ तो सीधे काबुल सरकार के सभी समूहों से सीधा सम्पर्क रखना चाहिए. इसी तरह से भारत को दूसरी दिशा में तालिबान संगठनों से भी सीधी वार्ता रखनी चाहिए. इस ऐतिहासिक उत्तरदायित्व को  वहन करते हुए दक्षिण एशिया की महाशक्ति के रूप में भारत को अपनी निर्णायक भूमिका पर जितना गंभीर रहना होगा, उतना ही सावधान भी.

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