कोरोना की दवाओं को लेकर भारत का प्रस्ताव, अमेरिका यूरोप की बजाए चीन का समर्थन

अजीब सी बात ये नहीं है कि भारत की कोरोना की दवाओं के प्रस्ताव को अमेरिका और यूरोप का समर्थन नहीं मिला, अपितु अजीब ये है कि इस विषय पर चीन का समर्थन भारत को मिला है..  

कोरोना की दवाओं को लेकर भारत का प्रस्ताव, अमेरिका यूरोप की बजाए चीन का समर्थन

नई दिल्ली.    ये पैसों का मामला है क्योंकि ये व्यापार का मामला है. तदापि मित्रों में व्यवसाय-व्यापार को समर्थन मिलता है पर यदि आपस में ही व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा हो तो समर्थन की बहुत अपेक्षा नहीं की जा सकती है.  कमाल की उलटबांसी भारत को देखने को मिली है ये कि ऐसी स्थिति में जब मित्रों ने मित्र के व्यावसायिक प्रस्ताव में अड़चन डाली हो तब अचानक अनपेक्षित रूप से उस देश से समर्थन भारत को मिला है जो मित्र देश तो कदापि नहीं कहा जा सकता है..

भारत ने की नियमों में छूट की मांग

चीनी वायरस कोरोना की दवावों को लेकर भारत ने विश्व के समक्ष एक प्रस्ताव रखा है जिसे अमेरिका और यूरोप क समर्थन नहीं मिला है जबकि चीन ने समर्थन दे कर भारत को अचम्भित कर दिया है. दरअसल कोविड की दवाओं के उत्पादन के लिए भारत ने विश्व व्यापार संगठन से नियमों में छूट की मांग की है. यह छूट की मांग इसलिए है ताकि भारत कोरोना की दवाओं का वैश्विक बाजार तैयार कर सके और उस बाज़ार के लिए खुद को भी तैयार कर सके.

WTO और WHO में अंतर है

यदि यह प्रस्ताव भारत ने डब्ल्यूएचओ में दिया होता तो इसे और अधिक समर्थन मिलने की उम्मीद की जा सकती थी क्योंकि WHO में चीन की चलती है जबकि WTO अमेरिका के प्रभाव में है. भारत ने अपनी कोरोना दवाओं के विश्व-बाज़ार के मार्ग की अड़चनें दूर करने के लिए WTO से निवेदन किया था कि सम्भव हो तो नियमों में छूट का प्रावधान किया जाए. किन्तु जो अपेक्षा भारत को थी वह नहीं हुआ, अमेरिका और यूरोप ने अड़ंगा लगाया तो चीन ने साथ दिया इस प्रस्ताव का.

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भारत के साथ है दक्षिण अफ्रीका

दक्षिण अफ्रीका के भारत के साथ आने का कारण यही है कि इन दोनों देशों ने मिल कर डब्ल्यूटीओ को इस संबंध में एक पत्र लिखा है. यह पत्र डब्ल्यूटीओ की वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि कोरोना महामारी से निपटने के लिए नई जांच, दवाएं और वैक्सीनों का निर्माण किया जा रहा है. दोनों देशों ने बताया कि चूंकि विकासशील देश इस महामारी से बहुत प्रभावित हुए हैं. इसलिए कोरोना महामारी से जुड़ी दवाइयों और दूसरे अहम मसलों से निपटने के लिए बौद्धिक संपदा नियमों में छूट दी जानी चाहिए.

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