अर्थव्यवस्था की टूटी कमर तो भारत को ज्ञान दे रहा है ईरान

पिछले दिनों दुनिया में धीरे-धीरे अलग-थलग पड़ रहे देश ईरान ने भारत पर टिप्पणी की. ईरान के विदेश मंत्री जावेद जारिफ ने कहा कि भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से ईरान से अपने रिश्ते खत्म कर रहा है. लेकिन सिर्फ तेल के आयात वाले रिश्तों के बल पर शेखी बघारने वाला ईरान यह भूल गया कि आतंकवाद और कट्टरपंथ को पालने वाले को रिश्तों की दुहाई देने का अधिकार नहीं होता.   

Written by - Satyam Dubey | Last Updated : Nov 21, 2019, 09:34 AM IST
    • आतंकी संगठनों का पोषक बन गया है ईरान
    • भारत के तेल ना खरीदने से ईरान को हो रहा घाटा
    • सऊदी अरब से बढ़ती नजदीकी खल रही ईरान को
    • ईरान की अर्थव्यवस्था की टूटी कमर
    • दूसरा पाकिस्तान बन चला है ईरान

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अर्थव्यवस्था की टूटी कमर तो भारत को ज्ञान दे रहा है ईरान

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय संबंध में जब कभी दो देश आपसी रिश्ते मजबूत करने के लिए मिलते हैं तो बात सिर्फ लेन-देन और खरीद तक ही सीमित नहीं होती. आर्थिक रिश्ते या जिसे व्यापारिक रिश्ते भी कहे जाते हैं, वह बस एक प्रत्यक्ष चीज है जिससे दो देश आपस में जुड़े हुए दिख सकें. लेकिन सामरिक रिश्तों की बुनियाद आर्थिक रिश्तों पर ही नहीं टिकी होती. विदेश मंत्री जावेद जरीफ भारत पर ईरान से रिश्ते खत्म करने के अमेरिकी दबाव का हवाला देते हुए यह बात भूल गए. उन्होंने कहा कि भारत ईरान से तेल इसलिए नहीं खरीद रहा कि उसे डर है कि अमेरिका उस पर आर्थिक और अन्य प्रतिबंध लगा सकता है. यह कहते हुए शिया कट्टरपंथियों के लिए जन्नत बन चुका ईरान अपने देश में आतंकी संगठनों के पनपने के माहौल पर कुछ विचार नहीं करता. 

आतंकी संगठनों का पोषक बन गया है ईरान

भारतीय पत्रकारों की एक टोली में महिला पत्रकार को संबंधित करते हुए जावेद जारिफ ने कहा कि भारत को अपनी रीढ़ इतनी मजबूत कर लेनी चाहिए कि उसे ईरान से तेल खरीदने पर अमेरिकी डर न सताए. दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को यह सीख आतंकी संगठनों के लिए हब बन चुका ईरान दे रहा है. अंसारूल्लाह, हिजबुल और यमन से लेकर ईराक तक में शिया आतंकियों का भरण-पोषण कर रहा ईरान यह चाहता है कि भारत उससे व्यापार कर उसे आर्थिक मजबूती दे. ताकि फिर से वह आतंकी संगठनों का पेट भर सके. 

भारत के तेल ना खरीदने से ईरान को हो रहा घाटा

ईरान ने भारत को यह चेतावनी दी कि अगर आप हमसे तेल नहीं खरीदेंगें तो हम आपसे चावल नहीं खरीदेंगे. लेकिन ईरान का इसमें अपना नुकसान है, वह यह बताना फिर भूल गया. विश्व भर में चावल की गुणवत्ता और अच्छी क्वालिटी भारत में ही पाई जाती है और निर्यात में चीन या किसी भी अन्य देश से किफायती ही होती है. इसके अलावा भारत और ईरान के बीच का रिश्ता 2019 के जून तक तकरीबन 18 बिलियन डॉलर का रहा था. पिछले साल तक यह 13.7 बिलियन डॉलर का था. दिलचस्प बात यह है कि भारत ईरान से 8 बिलियन डॉलर तक तो तेल ही खरीदता था. देखा जाए तो भारत-ईरान के बीच तेल व्यापार ही सबसे बड़ा था. ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश था. भारत ईरान से अपनी तेल जरूरतों का 10 फीसदी आयात करता था जबकि बड़ा हिस्सा ईराक और सऊदी अरब से करता था.

सऊदी अरब से बढ़ती नजदीकी खल रही ईरान को

ईरान से अपने सभी रिश्तों को खत्म करन के बाद भारत ने नया और मजबूत साथी सऊदी अरब को बना लिया है. भारत-सऊदी के रिश्ते एक नई परवान चढ़ रहे हैं. हाल ही में भारत ने सऊदी अरब के सबसे बड़े तेल खाद्यान अरामाको में अपना शेयर खरीदा है और अब भारत अपनी जरूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम है. भारत और सऊदी अरब के रिश्ते अब मध्य-पूर्वी देशों में सबसे अधिक तेजी से बढ़ रहे हैं. इसके अलावा भी भारत को दो नए तेल आयातक साझीदार भी मिल गए हैं. अमेरिका और मेक्सिको से भी तेल आयात करने के समझौते को हरी झंडी दिखा दी गई है. 

ईरान की अर्थव्यवस्था की टूटी कमर

भारत के साथ रिश्तों में ईरान को ही बड़ा घाटा हुआ है. अमेरिकी प्रतिबंधों से कट्टरपंथी देश ईरान की कमर तो टूट ही गई थी, लेकिन आर्थिक स्थिति भी अब काफी डावांडोल होती नजर आने लगी है. ईरान भारत से चाय, कॉफी, मसालों के अलावा खाद्य उत्पाद खरीदता था, जो अब उसकी जरूरतों के हिसाब से कम पड़ रही हैं. ईरान को इससे न सिर्फ 8 बिलियन डॉलर का घाटा हो रहा है बल्कि भारत के साथ प्रिफेरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट (Preferential Trade Agreement)पर हस्ताक्षर न हो पाने का मलाल भी है. 

दूसरा पाकिस्तान बन चला है ईरान

भारत-ईरान संबंधों को सबसे ज्यादा प्रभावित कट्टरपंथी देश के आतंकी गतिविधियों पर चुप्पी ने किया है. दोनों देशों के बीच आतंकवाद को लेकर ईरान कभी गंभीर नहीं रहा, जो वर्तमान में भारत की विदेश नीति का एक अहम हिस्सा बन गया है. भारत यह चाहता था कि दक्षिण भारत में अंसारूल्लाह और हिजबुल संगठन के स्लीपर सेल और आतंकियों पर पाबंदी कसे और दूसरा पाकिस्तान न बने. हालांकि, सामरिक रिश्तों की दुहाई देने वाला ईरान इस पर कुछ न कर सका और अब रिश्तें खत्म कर लेने पर अमेरिकी प्रतिबंधों का हवाला दे असल कारणों की अनदेखी कर रहा है. 

 

 

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