close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

RCEP समझौता: भारत को फायदा या नुकसान ?

साल 2014 के बाद से भारत की छवि वैश्विक स्तर पर बेहद प्रभावी नजर आई है. वैश्विक मामलों में देश अगुआ की भूमिका में भी नजर आया है. भारत का प्रभाव कुछ ऐसा हो चला है कि वैश्विक संगठनों में इसकी साख को लेकर आसियान देशों तक में वर्चस्व साफ दिखने लगा है. 

RCEP समझौता: भारत को फायदा या नुकसान ?

नई दिल्ली: फिलहाल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाइलैंड दौरे पर हैं जहां वे आसियान सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. इस दौरान भारत RCEP( क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक सहयोग) पर हस्ताक्षर कर आसियान के विश्व की प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार करने की ड्रीम योजना को एक अमली जामा पहनाने में मदद कर सकता है. इस सहमति में भारत को आसियान के 10 देशों के अलावा अन्य 5 देश चीन, जापान, कोरिया, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार सहमति को हरी झंडी देनी होगी. हालांकि, इस पर भारतीय राजनायिकों के दो अलग-अलग राय हैं और अपने-अपने तर्क भी. 

पक्ष-विपक्ष की तू-तू मैं-मैं

इस मामले की अहमियत भारत के लिए कितनी है, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि बहुत कम मौकों पर बोलने वाली कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भारत सरकार से इस समझौते पर हामी न भरने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि भारत को इससे आर्थिक नुकसान हो सकता है. छोटे देश इसका फायदा उठा रहे हैं. इसका जवाब देते हुए केंद्रीय उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने लगातार ट्वीट करते हुए कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी अचानक ही RCEP के समय जग गई हैं, लेकिन तब कहां थीं जब 2010 में आसियान के साथ, कोरिया के साथ और 2011 में जापान और मलेशिया के साथ मुक्त व्यापार संधि पर सहमति बनी. 

क्यों जरूरी है RCEP पर भारत की सहमति ?

RCEP पर भारत सहित सभी 6 देशों की सहमति के बाद ये वैश्विक संगठन दुनिया में सबसे प्रभावी संगठन बन कर उभरेगा. इसको कुछ यूं समझें कि इस पर सबकी सहमति के बाद इस संगठन की कुल जनसंख्या 3.4 बिलियन से भी अधिक होगी जो दुनिया की कुल आबादी का 49 फीसदी हिस्सा होगा. इतना ही नहीं RCEP देशों की कुल जीडीपी 17 ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक की होगी और दुनिया के कुल व्यापार में इनका हिस्सा 40 फीसदी तक का हो जाएगा. इस समझौते के बाद सभी 16 देश जिनमें आसियान के 10 देश और 6 विकासशील देश शामिल हैं, उनके बीच मुक्त व्यापार से एशियाई देशों की हिस्सेदारी भी वैश्विक स्तर पर बढ़ेगी. आसियान देशों में कुछ देश ऐसे भी हैं जिनकी अर्थव्यवस्था में कुछ क्षेत्रों का योगदान इस कदर है कि उनसे बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है. 

आसियान देशों को इससे बड़े फायदे की उम्मीद

दरअसल, 1967 में आसियान देशों के गठन के बाद 90 के दशक में इससे भारत की नजदीकी बढ़ी. जाहिर है नजदीकी बढ़ने के असली मायने व्यापार बढ़ने को लेकर है. भारत के साथ-साथ पड़ोसी देश चीन भी आसियान से खूब मेल-मिलाप में रहा. साल 2011 में आसियान देशों ने RCEP की नींव डालने का प्रस्ताव छह उन देशों के सामने रखा जो विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यव्स्थाओं में शुमार हैं. भारत और चीन के अलावा, आस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया के साथ-साथ न्यूजीलैंड भी आसियान के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल है. पिछले कुछ सालों से आसियान सम्मेलन में आसियान के सभी 10 देश इस फिराक में हैं कि किसी तरह से इस प्रस्ताव पर सभी छह देशों की सहमति प्राप्त कर ली जाए, लेकिन भारत, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड कुछ तकनीकी कारणों को लेकर अब तक इसे टालते रहे. 

भारत-चीन व्यापार विवाद है असली बाधा का कारण

माना जा रहा है कि भारत की ओर से सबसे बड़ी बाधा चीन है जिसे इस सहमति के बाद भारतीय बाजार को अपने उत्पादों से भर देने का लाइसेंस प्राप्त हो जाएगा. जबकि भारत-चीन के बीच व्यापार समझौते में अब तक चीन ही ज्यादा फायदा उठाते आया है. चीन की ओर से आयातित सामानों का एक बड़ा जखीरा भारत जैसे वृहद बाजार में आसानी से आ जाता है जिसपर भारत उपयुक्त और कम करों के साथ अपनी रजामंदी दे देता है. लेकिन जब बारी चीन की आती है तो चीन भारतीय उत्पादों पर कड़े कर और चुंगी लगाकर व्यापार में बाधा पहुंचाने पर उतारू हो जाता है. 

जब आसियान देशों ने चीन के ऊपर भारत को दी अहमियत

चीन को अपने उत्पादों के लिए बाजार की इस कद्र जरूरत है कि ड्रैगन ने आसियान देशों के सामने एक प्रस्ताव रख दिया है. उस प्रस्ताव में चीन ने आसियान देशों से भारत, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बिना ही RCEP पर चीन, कोरिया और जापान के साथ हस्ताक्षर कर मुहर लगाने का प्रस्ताव रख दिया है. हालांकि चीन ने यह भी कहा कि तीनों ही देशों के लिए जगह को खाली छोड़ दिया जाएगा ताकि जब अनुकूल लगे ये देश इस सहमति पर हस्ताक्षर कर इसका हिस्सा बन सकें. चीन के इस प्रस्ताव को आसियान में भारत के करीबी देशों ने खारिज कर दिया. उनका मानना है कि भारत जैसे प्रगतिशील अर्थव्यवस्था के बिना यह सहमति उतना बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएगी. 

भारत को क्या है नफा और क्या नुकसान

भारत में इसको लेकर दो धड़े खड़े हो गए हैं. इस प्रस्ताव पर सहमति के पक्ष में आने वालों का मानना है कि भारत को इससे विदेशी निवेश में बड़ा फायदा होगा जिसका जीडीपी में एक बहुत बड़ा हिस्सा है. इसके अलावा आईटी सेक्टर, सर्विस, स्वास्थ्य क्षेत्रों में भी व्यापारिक रिश्ते और विदेशी प्लेयर्स की संख्या बढ़ेगी. सबसे अहम इस सहमति के बाद एशिया-पैसिफिक के बीच सामरिक रिश्ते और आर्थिक गतिविधियों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं. वहीं दूसरे पक्ष जिनका मानना है कि भारत को इस पर सहमति नहीं देनी चाहिए क्योंकि पहले से ही जिन देशों के सात मु्क्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किए गए हैं, उनसे भारत को कुछ खास फायदा नहीं हुआ है. बल्कि उन छोटे देशों को ही अपने-अपने उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार मिल गया है. भारत का निर्यात स्थिर तो नहीं पर उतनी तेजी इस मुक्त व्यापार संधि का फायदा नहीं उठा पा रहा.