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RCEP से हमारा केवल घाटा, उनका कुछ नहीं जाता

भारत ने 4 नवंबर को RCEP समझौते से किनारा कर लिया. हालांकि पहले से ही बाजार विशेषज्ञ इस समझौते को देश की मौजूदा स्थितियों के लिहाज  से ठीक नहीं बता रहे थे. इनकार का फैसला होने के बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने ट्वीट कर कहा कि भारत ने वैश्विक दबाव के आगे घुटने नहीं टेके. प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर साबित किया कि वह गरीबों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं.  इस समझौते के लिए चीन का खास दबाव था, जबकि भारत को चीन से ही सबसे अधिक घाटे उठाना पड़ता.

RCEP से हमारा केवल घाटा, उनका कुछ नहीं जाता

नई दिल्ली. भारत ने 4 नवंबर को RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप) से किनारा कर लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी के तहत शिखर सम्मेलन में थाइलैंड गए थे, लेकिन न्यूज एजेंसी ANI  ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि भारत ने RCEP  में शामिल होने से इनकार कर दिया है. यह कई मामलों में देश के व्यापार और खास तौर पर श्रमिक-कामगारों के हित में नहीं था. इस समझौते से और क्या हानियां थीं, डालते हैं एक नजर

क्या है RCEP
RCEP दस आसियान देशों (ब्रुनेई, इंडोनेशिया, कंबोडिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, विएतनाम) और 6 अन्य बड़े देशों (भारत,ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया) के बीच एक मुक्त व्यापार समझौता है. यह एक फ्री ट्रेड अग्रीमेंट की तरह होता, जिसके तहत इन 16 देशों के बीच बिना किसी शुल्क के व्यापार हो सकता था. देश में इस समझौते को लेकर पहले से ही मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही थी. विपक्षी राजनीतिक दलों के अलावा किसान औऱ मजदूर संगठन भी इसका विरोध कर रहे थे. RCEP को लेकर 2012 से बातचीत के दौर जारी हैं और साल 2016 के बाद से इसमें काफी तेजी आई. अगर यह समझौता होता तो एक तरह से दुनिया के लिए अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होता. आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की आधी आबादी इन्हीं 16 देशों में रहती है. दीगर है कि भारत-चीन बड़ी जनसंख्या वाले देशों में प्रमुख हैं. इस तरह विश्व भर की जीडीपी का कुल 30 फीसद हिस्सा भी इन 16 देशों में है. समझौता न होेने पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि भारत वैश्विक दबाव के आगे झुका नहीं.

भारत के लिए हानिकारक था फ्री ट्रेड अग्रीमेंट
म्यांमार और मैक्सिको में भारत के पूर्व राजदूत रहे हैं राजीव भाटिया. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में इस अग्रीमेंट को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं, साथ ही समझौते की कई हानियों को लेकर संकेत दिए थे. बकौल भाटिया भारत के लिए यह समझौता राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से अहम है. इसे लेकर आर्थिक महत्व के आधार पर ही फैसला करना सही होगा. अगर भारत को लगेगा कि समझौते की सभी शर्तें देश के लिए फायदेमंद हैं तो ही इसे स्वीकार किया जाएगा. इसके मसौदे में कई बदलाव की गुंजाइश हैं. अगर सभी साझेदार देश अपेक्षित सहयोग नहीं देंगे तो इस समझौते को होल्ड किया जाएगा.

भारत में बड़ा चीनी बाजार थी सबसे बड़ी परेशानी
इस समझौते की सबसे बड़ी हानि तो यही है कि भारत का पूरा बजारा चीनी समानों से भरा होता. उत्पादन के मामले में चीन फिलवक्त में भारत का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी है. मेक इन इंडिया के बाद से मेड इन चाइना को टक्कर मिली है. साथ ही बीते सालों में एक तरीके से भारत में चीनी सामानों के बहिष्कार का माहौल भी तैयार हुआ है और अधिक से अधिक स्वदेशी अपनाने की जागरूकता बढ़ी है. समझौते को लेकर इस पर सहमति नहीं बन पा रही थी कि भारत के बाजार में चीनी सामान की खेप उचित अनुपात में आए साथ ही भारत भी चीनी बाजार में बड़े पैमाने पर सामान बेचे. ऐसे में समझौते पर हस्ताक्षर यानी चीनी बाजार को खुला निमंत्रण और खुद पैर पर कुल्हाड़ी मारना

आसियान देशों से हमारा व्यापार घाटा बड़ा है
भारत आसियान देशों के साथ व्यापार घाटे में है. यानी कि इन 16 देशों से 11 देशों से हम जितना सामान खरीदते हैं उससे कहीं कम उन्हें बेचते हैं. भारत का चीन के साथ ही व्यापार घाटा सबसे अधिक है. पिछले महीने (13 अक्टूबर) को जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे तो प्रधानमंत्री के साथ बातचीत में यह मसला उठा था. उस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा कम करने का भरोसा दिलाया था. साल 2018 में भारत ने चीन से 95 अरब डॉलर का कारोबार किया था और इस लिहाज से 57.86 अरब डालर का घाटा हुआ. यह स्थिति इसलिए है कि क्योंकि भारत खरीद की तुलना बेहद कम सामान बेच रहा है. फ्री ट्रेड अग्रीमेंट से यह खाई और बढ़ जाती.

अग्रीमेंट में स्पष्ट नहीं थी नीतियां
भारत के कृषि मंत्रालय ने भी इस समझौते पर चिंता जताई थी. केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि हमारे लिए किसानों का हित सबसे ऊपर है, RCEP पर अपने विचार से वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को अवगत करा दिया है. किसानों को चिंता है कि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होने से आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से आयात शुल्क मुक्त दूध का पॉउडर व अन्य दुग्ध उत्पाद भारत आएगा, जो काफी सस्ता होगा. इससे देश के डेयरी उत्पादकों व किसानों को नुकसान होगा. इसके अलावा RCEP डील में श्रम मानक, भ्रष्टाचार व खरीदारी की प्रक्रिया पर स्पष्टता नहीं है. मजदूर संगठन इसी बात का विरोध कर रहे हैं.

एसबीआई ने भी दी थी बुरे असर की चेतावनी


स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट में RCEP डील से बुरा असर पड़ने को लेकर चेताया था. रिपोर्ट के मुताबिक जिन 15 देशों से समझौता होना था, उनमें से 11 देशों से बीते सालों में भारत का दो पक्षीय व्यापार घाटे में रहा है. आसियान के देशों से फ्री ट्रेड का भी अनुभव भारत के लिए ठीक नहीं रहा है. बाजार विशेषज्ञों ने भी चिता जाहिर करते हुए बताया था कि सभी 16 देशों की आमदनी एक सी नहीं है. ऑस्ट्रेलिया में प्रति व्यक्ति सालाना आय 55 हजार डॉलर है तो वहीं कंबोडिया की औसतन प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी 1300 डॉलर है. यह आर्थिक अंतर गरीब देशों को नुकसान पहुंचाएगी. इसके अलवा डेयरी उत्पाद, ई-कॉमर्स और डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट को लेकर भी बाजार की चिंताएं हैं.

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