सीरिया हमले पर अमेरिका-रूस के बीच तनातनी या दोस्ती ?

एशिया के मध्य-पूर्वी क्षेत्र में अस्थिरता हमेशा से कायम रही है. कभी ईरान-सउदी के बीच के विवादों की वजह से तो कभी बाहरी देशों के द्वारा जबरन युद्ध थोपे जाने की वजह से. अभी ईरान-सउदी के बीच की गुत्थी का सुलझना बाकी ही था कि तुर्की ने सीरिया के कुर्द कबीलों पर आक्रमण कर नए रक्तरंजिश की शुरूआत कर दी. अब इस नए बखेड़े के कई कूटनीतिक मायने निकलने शुरू हो गए हैं.

सीरिया हमले पर अमेरिका-रूस के बीच तनातनी या दोस्ती ?

नई दिल्ली: एक ओर जहां पूरा विश्व सीरिया के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है वहीं दूसरी ओर तुर्की को तबाही का मंजर भी साफ दिखने लगा है. ऐसे बड़े कम मौके आते हैं जब विश्व के दो धुर-विरोधी देश अमेरिका और रूस एक साथ खड़े नजर आते हों. आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिकी लड़ाकों का साथ देने वाले कुर्द पर तुर्की के हमले के बाद पहली बार रूस ने सीरिया के संग हाथ मिलाया है. 

सीरिया और रूसी सरकार ने तुरंत संभाला मोर्चा

कुर्दों पर तुर्की के हमले के बाद कुर्दों ने सीरिया के राष्ट्रपति अल असद व रूसी सरकार से मदद मांगी, जिसपर सीरियाई और रूसी सरकार ने तुरंत एक्शन लिया. रूस ने कुर्दों का साथ देने के लिए रूसी सैनिकों को जंगी हथियारों के संग भेज दिया. हालांकि, ये सब यहीं शुरू नहीं हुआ. सीरिया में तकरीबन एक दशक से अमरीकी सेना की मौजूदगी के बावजूद आखिर ऐसा क्या हुआ कि अमेरीका का धुर-विरोधी देश रूस, सीरिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है. दरअसल, इसके दो पहलू हैं. पहले के हिसाब से इस बदलाव की बयार के मार्गदर्शक अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को माना जा सकता है. पिछले वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का ऐलान कर दिया, जिसके बाद सीरियाई सरकार अचरज में पड़ गई. सीरियाई सरकार ने फिर इसके बाद पर्दे के पीछे रहकर रूस से बातचीत करनी शुरू कर दी. कूटनीतिक स्तर पर और अप्रत्यक्ष रूप से सीरिया ने रूस के साथ कई समझौतों पर भी हामी भर दी है जिसका खुलासा आधिकारिक रूप से अभी नहीं हुआ है. 

सीरिया में पांव जमाने को बेताब है रूस

वैश्विक जानकारों की मानें तो रूस अरब क्षेत्र में अपनी साख बढ़ाने के मौके की तलाश में था. अमेरिकी सेना के पीछे हटने की घोषणा के साथ ही उसे इस क्षेत्र में पांव जमाने का बढ़िया मौका मिल गया. इस्लामिक स्टेट से भिड़ने वाली कुर्द सेना को सीरिया और रूस का साथ तो मिल गया है, पर जिन 30 फीसदी क्षेत्रों पर कुर्द सेना ने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर आतंकियों के प्रभाव से आजाद कराया था, उस पर सीरिया और रूस की धाक जमती अब दिखने लगी है. इस हमले के बाद से सीरियाई राष्ट्रपति अल असद की तारीफ हर जगह होने लगी है जिसका मतलब है कि कुर्द के इलाकों में भी अब सीरियाई राष्ट्रपति का कद बढ़ने वाला है.

अमेरिका-रूस में फिर शुरू हुई कूटनीतिक जंग

अमेरिका ने पिछले दिनों तुर्की के द्वारा सीरिया पर किए गए हमले की निंदा की और तुर्की के साथ चल रहे व्यापार पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसे पीछे हट जाने को आगाह किया. वहीं दूसरी ओर रूस इस हमले के बाद कुर्दों पर पूरी तरह से कंट्रोल में दिख रहा है. मॉस्को के प्रवक्ता ने एक जानकारी देते हुए कहा कि रूस तुर्की से बातचीत कर समस्या का हल निकालने की कूटनीतिक कोशिश भी कर रहा है. जल्द ही सीरिया और तुर्की के बीच के विवाद का निपटारा कर लिया जाएगा. उधर अमेरिका भी अपनी जोर-आजमाइश का बखान कर सीरिया पर अपने कंट्रोल को बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ है. अमेरिका के उप-राष्ट्रपति माइक पेंस ने बताया कि ट्रंप ने तुर्की के प्रमुख रेचप तय्यप एर्दोवान से बात की है और आगाह किया है कि तुर्की के सैन्य अभियान को तत्काल रोका जाए. पेंस ने ये भी कहा कि ट्रंप उन्हें हालात का जायजा लेने के लिए मध्य-पूर्व के इलाकों में भेज रहे हैं.

अब सवाल ये है कि कम मौकों पर साथ खड़े दिखने वाले दो प्रतिद्वंदी देश अमेरिका और रूस में से अब किस देश का अधिकार कुर्द या यूं कहें कि सीरिया पर होगा. इस हमले के बाद विश्व के सभी छोटे से बड़े देश कुर्द कबीले के साथ खड़े है. सिर्फ एकमात्र पाकिस्तान न जाने क्यों तुर्की के हमले के तर्क को सही ठहरा रहा है.