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क्यों कंगाल हो रहा है संयुक्त राष्ट्र? जानते हैं इसके पीछे का राज

क्या विश्व वाकई आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया है ? क्या संयुक्त राष्ट्र(UN) जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन भी कंगाल होने की स्थिति पर आ गए हैं ? क्या है इसके पीछे का राज?  आइए इसकी पड़ताल करते हैं...

क्यों कंगाल हो रहा है संयुक्त राष्ट्र? जानते हैं इसके पीछे का राज
संयुक्त राष्ट के दिवालियापन के पीछे क्या है राज

नई दिल्ली: हाल के दिनों में जब बड़ी अर्थव्यस्था से ले कर छोटी अर्थव्यस्था तक आर्थिक मंदी की चपेट में है, तब देश वैश्विक संगठनों के दरवाजे खटखटाते हैं, आर्थिक और तकनीकी सहायता के लिए. लेकिन तब क्या हो जब मदद देने वाला खुद ही मदद की गुहार लगाने लगे.

संयुक्त राष्ट्र सेक्रेटरी जनरल ने लगाई गुहार
 दरअसल, हुआ ये है कि संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटेरस ने मंगलवार को चेतावनी देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र के पास अब इतने आर्थिक संसाधन भी नहीं कि वह अपने कर्मचारियों को अगले महीने का वेतन भी दे पाए. 
एंटोनियो गुटेरस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बजटीय समिति को आगाह करते हुए कहा कि अगर जनवरी तक यूएन अपने खर्च को कम करने पर काम नहीं करता है तो संयुक्त राष्ट्र अगले वर्ष सितंबर महीने में होने वाली वार्षिक बैठक को भी आयोजित करा पाने में सक्षम नहीं होगा. संयुक्त राष्ट्र इस हालात तक तब पहुंचा जब उसके सबसे बड़े सहयोगी राष्ट्र अमरीका ने अपनी हिस्सेदारी अचानक ही कम कर ली. दरअसल, अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस सहायता राशि को फिजूल खर्च और अमरीका पर अतिरिक्त दबाव बताकर इस फैसले को अमरीकी हित में बताया. 

अमरीकी वर्चस्व है यूएन में भी कायम
बहरहाल, अमरीकी फैसले का ये असर पड़ना लाजिमी है, क्योंकि यूएन कोष में अमरीकी हिस्सेदारी 22 प्रतिशत है. अमरीका हर साल संयुक्त राष्ट्र को 10 बिलियन डॉलर देता है, जो चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस जैसे पी-5 देशों की कुल सहायता राशि से भी अधिक है. 1945 में गठित संयुक्त राष्ट्र के फिलहाल 193 सदस्य देश हैं, और यह ट्रस्टीशीप पर चलता है. जाहिर है, खुद की कमाई का जरिया न होने के कारण इसे सदस्य देशों पर सहायता राशि के लिए निर्भर रहना पड़ता है.

महासचिव ने सुझाए ये जरूरी कदम
यूएन महासचिव गुटेरस ने सितंबर महीने में कुछ जरूरी बदलाव के आदेश भी जारी किए हैं: 

जैसे कि खाली रिक्तियों पर सिर्फ अत्यंत जरूरी पदों को भरा जाए

कुछ गैर-जरूरी बैठकों को निरस्त करना

और तो और यूएन पीसकीपिंग मिशन की राशि में कटौती, जिसमें अमरीकी सहायता की 28 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. 

आर्थिक मंदी या साजिश !
भारत, ब्राजील, जापान जैसे देशों की भी हिस्सेदारी बड़ी है पर उतनी नहीं कि अमरीकी सहायता की भरपाई कर सके. ऐसे में सवाल अब भी रह जाता है कि आखिर संयुक्त राष्ट्र इस हालत के साथ वैश्विक खतरों का निपटारा कैसे कर पाएगा ? सवाल यह भी रह जाता है कि सहायता राशि में कटौती कर अमरीका कहीं विश्व और वैश्विक संगठनों पर अपने घटते वर्चस्व को वापस पाने के लिए नए एजेंडे तो नहीं अपना रहा ?