यमुनानगर का सुखराम गोताखोर, लोगों की जान बचाते-बचाते 35 साल में यमुना मैया से जुटाए बेशकीमती ऐतिहासिक सिक्के

यमुनानगर में यमुना नदी की गोद में 35 साल का तैरने वाला सुखराम ईमानदार होने के बाद आज भी बेशकीमती सिक्कों का मालिक है.

यमुनानगर का सुखराम गोताखोर, लोगों की जान बचाते-बचाते 35 साल में यमुना मैया से जुटाए बेशकीमती ऐतिहासिक सिक्के

कुलवंत सिंह/यमुनानगर: यमुनानगर में यमुना नदी की गोद में 35 साल का तैरने वाला सुखराम ईमानदार होने के बाद आज भी बेशकीमती सिक्कों का मालिक है. आज भले ही उसकी उम्र 53 साल हो,  लेकिन आज भी लोगों की जान बचाने के काम में निस्वार्थ यमुना नदी में छलांग लगा देता है.

यमुनानगर में यमुना नदी में डूबते लोगों की जान बचाने वाला और नदी से हजारों शव निकाल चुका सुखराम यमुनानगर में किसी पहचान का मोहताज नहीं है. क्योंकि सुखराम अब तक 5684 से भी ज्यादा लोगों को यमुना नदी से बाहर निकाल चुका है, जिनमें लोगों की जान बचाना और शव निकालना शामिल है.

सुखराम जब करीब 17 साल का था तब से इस काम में ईमानदारी से जुट गया था. वहीं सुखराम की पहचान इसलिए भी है क्योंकि आज तक उसने कभी किसी शव या किसी शख्स की जान बचाने की कीमत नहीं ली. वह ये सब सेवा भाव से करता आ रहा है. सुखराम बताते हैं कि उनका परिवार विश्वकर्मा मोहल्ले में रहता था और उनके बड़े भाई दिलावर सिंह ने उसे जबरदस्ती तैरना सिखाया. पहले ही दिन उनके बड़े भाई ने उन्हे एक बड़े खड्डे में धकेल दिया और उसके बाद उनका तैराकी जीवन शुरु हुआ.

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आज उनका इतना स्टैमिना है कि दादूपुर से यमुना में छलांग लगाकर यमुनानगर आ निकलते हैं, यानि 16 किलोमीटर एक बार में ही तैर जाते हैं. उन्होने बताया कि कई बार शवों को और लोगों को निकालते वक्त काफी कठिनाईयां आई, लेकिन 35 साल के इस दौर में उन्होने कभी हार नहीं मानी.

35 साल से बचा रहा लोगों की जान

इस बीच उनकी शादी दिल्ली निवासी गीता के साथ हुई और एक तरफ वैवाहिक जीवन और दूसरी तरफ ईमानदारी से सेवाभाव का काम जारी रखा. लोगों की जान बचाते-बचाते उन्हें एक और शोक लग गया. ज्यादातर गर्मी और बरसात के सीजन में ही यमुना नदी में लोग डूबते हैं. लेकिन, सुखराम का यमुना से इतना लगाव हो गया की वो सर्दियों में भी यमुना में ही नहाने पहुंचते और इसी दौरान उन्होंने यमुना से सिक्के निकालने शुरु कर दिए.

सुखराम बताते हैं कि यमुना से उन्हें सोने चांदी से लेकर भिन्न-भिन्न धातुओं के सिक्के मिले. लेकिन, परिवार का गुजर बसर करने के लिए मुसीबत आने पर उन्हें कई बार ये सिक्के बेचने पड़े और यदि वो सिक्के ना बेचते तो आज उनके पास करीब 2 क्विंटल बेशकीमती सिक्के होते. सिक्के बेचने के बाद अब भी करीब आधा क्विंटल सिक्के सुखराम के पास हैं.

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नदी से मिले बेशकीमती, ऐतिहासिक सिक्के

सुखराम के पास ऐतिहासिक सिक्के यानि मुगल काल, अंग्रेजी शासन से लेकर चाइनिज सिक्कों की भरमार है. यहां तक की हाथ से बने हुए सिक्के भी सुखराम के पास हैं. सुखराम ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं. इसलिए वे ये भी नहीं जानते की इन सिक्कों की आज के दौर में क्या कीमत है, लेकिन उनका जज्बा अब भी वहीं है वो आज भी सिक्के निकालते हैं और लोगों की जान बचाने का भी निशुल्क काम करते हैं.

उन्होंने बताया कि इस काम के लिए उनका परिवार भी उनका साथ देता है, लेकिन वे अपने बच्चों को इस काम में नहीं धकेलना चाहते और उन्होंने अपने बेटे को तैराकी नहीं सिखाई. उनके पास दो बच्चें हैं एक बेटा और एक बेटी. बेटी 8वीं कक्षा में पढ़ती है और बेटा सुखराम की सौफे की दुकान संभालता है साथ ही उनके बड़े भाई के चार बेटे भी उनकी सोफे की दुकान पर ही काम करते हैं.

साथ ही उन्होंने बताया कि प्रशासन ने उन्हें कई बार सम्मानित भी किया और चौटाला सरकार में नौकरी का भी ऑफर मिला, लेकिन जब वे बताए स्थान पर पहुंचे तो उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया और एक बार ऐसा वाक्या भी हुआ कि उन्हें कहा गया कि उन्हें 10 हजार रुपए का चेक दिया जा रहा है, लेकिन लिफाफा खोल कर देखा तो उसमें सिर्फ 2 हजार का चेक था. लेकिन, उन्हें कोई मलाल नहीं है वे लगातार इसी तरह सेवा करते रहेंगे.

बता दें कि उनकी पत्नी बताती हैं कि उन्हें गर्व होता है कि उनके पति लोगों को बचाने का काम बड़ी ईमानदारी से और निशुल्क करते हैं. किसी की जान बचाने से बड़ा कोई पुन्य नहीं हो सकता और वे कभी अपने पति को इस काम के लिए मना नहीं करती. सुखराम के पास इकट्ठे किए गए अन्ना,  दुअन्ना, क्वाटर अन्ना, तांबे का एक पैसा, चार आने सहित अन्य सिक्के हैं.

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आपको बता दें कि मुगलकालीन 16वीं शताब्दी के भी काफी सिक्के हैं. आर्थिक हालत खराब होने पर उन्होंने कुछ समय पहले सोने और चांदी के सिक्के बेच दिए. सुखराम का कहना है कि उनकी 53 साल की उम्र हो गई. आज तक बुखार नहीं हुआ. उनका तर्क है कि यमुना में लंबे समय तक रहते हैं.

इसमें जड़ी-बूटियों का पानी आता है. इसलिय उनसे बीमारी दूर रहती है. फिलहाल, आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए सुखराम अपने बेशकीमती सिक्को को बेचना भी चाहते हैं, लेकिन उन्हे ठगों का भी डर रहता है और वे बताते हैं कि उनके जान पहचान वाले और रिश्तेदार भी कई बार उनसे बेशकीमती सिक्के ले जा चुके हैं.

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