बिहार के जमुई जिले के झाझा प्रखंड के एक छोटे से गांव में पंचर जोड़कर अपने परिवार चलाने वाले सरफराज अंसारी रहते हैं, उन्होंने वो गाँव की नदी पर अपनी कोशिशों से एक पुल बना दिया है, जिससे 40 गाँव के लोगों को आने वाले दिनों में फायदा होगा. सरफ़राज़ ने ये काम अपनी माँ की मोहब्बत में किया है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.
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नई दिल्ली: कहते हैं प्यार, मोहब्बत और इश्क में बड़ी ताकत होती है.अगर ये अपने रब से हो तो आदमी वली बन जाता है, और किसी औरत से हो तो वो सखी (उदार) बन जाता है. प्रेम आदमी को एक हस्सास इंसान बना देता है, चाहे वो अपनी माँ से हो या महबूब से हो. आदमी हमदर्द बन जाता है, जो दूसरे के दुःख और दर्द को अपना समझने लगता है.
बिहार के गया में अपनी बीवी से मोहब्बत में दसरथ मांझी ने पहाड़ का सीना चीड़कर पूरे गांव वालों के लिए कभी रास्ता बना दिया था. उसी बिहार में अब एक पंचर बनाने वाले सरफराज अंसारी ने अपनी माँ से मोहब्बत की याद में अपनी कमाई का तिनका- तिनका जोड़कर गाँव वालों के लिए पुल बना दिया है. जो काम बिहार में सरकार और पूरा गाँव मिलकर नहीं कर पाया उसे एक पंचर जोड़ने वाले आदमी ने कर दिखाया है. सरफराज अंसारी के इस काम से गाँव के हजारों लोगों की वर्षों की परेशानी अब हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.
बिहार के जमुई जिले के झाझा प्रखंड के एक छोटे से गांव में सरफराज अंसारी नाम का एक शख्स रहता है. वो पंचर जोड़कर अपने परिवार का गुज़र- बसर बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं. इसके बावजूद सरफ़राज़ ने गाँव में पुल बना दिया है, जो पूरे इलाके में चर्चा का मौजूं बन गया है.
साल 2019 में सरफराज अंसारी की मां बीमार पड़ गई थी. गाँव से बाज़ार का रास्ता बिना पुल वाली एक नदी को पार कर तय करना पड़ता था. जब सरफराज अंसारी की मां बीमार हुई तो वो बारिश का मौसम था. नदी में लबालब पानी भरा था. उफनती नदी को पार सरफराज को अपनी माँ को अस्पताल ले जाना पड़ा था. इस काम में बहुत परेशानी उठानी पड़ी थी. अस्पताल पहुंचकर सरफ़राज़ की मां ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. तब सरफ़राज़ को लगा कि अगर वो थोड़ा और पहले वक़्त पर अस्पताल पहुँच जाता तो शायद उसकी माँ बच जाती.
सरफराज अपनी माँ की मौत की वजह उस नदी को मानने लगा. माँ को खोने का गम सरफराज को सालता रहा. तभी उसने संकल्प लिया कि अब गांव के किसी भी बीमार इंसान को नदी पार करने में जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ेगी. वो नदी पर पुल बनाएगा.
आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद सरफराज ने हिम्मत नहीं हारी. वो पंचर की दुकान से होने वाली रोजाना की कमाई में से वे तिनका-तिनका जोड़कर पैसे बचाता रहा.जब उसके पास कुछ पैसे जमा हो गए तो उसने गाँव वालों से अपनी दिली तमन्ना शेयर किया. गाँव वालों को सरफराज की बात बहुत अच्छी लगी और सभी ने उसके प्लान की तारीफ की. सरफ़राज़ की इस कोशिश में गाँव वालों का भी तआवुन मिलने लगा और इज्तेमाई हिस्सेदारी से पुलिया की तामीर का काम शुरू किया गया. बिना किसी सरकारी मदद के ग्रामीणों के सहयोग और श्रमदान से इस पुलिया को बनाया गया है.
यह पुलिया तकरीबन 25 फीट लंबी, 13 फीट चौड़ी और 8 फीट ऊंची है. ग्रामीणों के मुताबिक, इसकी तामीर से लगभग 40 गांवों की आबादी को सीधा फायदा मिलेगा. पहले बरसात के दौरान लोगों को कई किलोमीटर घूमकर शहर जाना पड़ता था या फिर जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती थी. इस पुल के बन जाने से अब बच्चों को स्कूल जाने, किसानों को बाजार और मरीजों को अस्पताल पहुंचने में काफी सुविधा होगी.
मकामी जनप्रतिनिधियों और अफसरों ने भी सरफराज के इस काम की तारीफ की है. उनका कहना है कि यह पहल समाज के लिए प्रेरणादायक है, अगर लोग इसी तरह सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं तो किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है.
सरफराज अंसारी कहते हैं, “मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूं, लेकिन आदमी का दिल बड़ा होना चाहिए. मां को खोने का दुख आज भी है, मगर सुकून है कि अब किसी और की मां-बेटी को उस दर्द से नहीं गुजरना पड़ेगा, जो मेरी मां ने भोग था.”
सरफराज अंसारी ने आगे कहा, " दुनिया के लिए ये महज सीमेंट और सरिया से बना एक कंक्रीट का पुल हो सकता है, लेकिन मेरे लिए ये एक सपने का सच होने जैसा है. अपनी कमाई से थोड़ा-थोड़ा बचाकर और गांव वालों के सहयोग से यह पुलिया बन पाई है. अब लोगों को राहत मिल रही है, यही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है.”
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