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1997 बैच के आईपीएस कैसर खालिद इस वक़्त महाराष्ट्र पुलिस के एडिशनल डायरेक्टर जनरल( ADG) हैं. वो एक आईपीएस होने के साथ-साथ एक लेखक, शायर, मोटिवेशनल स्पीकर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी हैं. वो लाखों नौजवानों के रोल मॉडल हैं. वो देश की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं सहित विदेशों में लेक्चर दे चुके हैं. उनके नाम पर 100 से ज्यादा अवार्ड दर्ज हैं. वो कवि और शायरों के बीच अपनी रचनाओं का पाठ करते हैं. वो अपनी साहित्यिक और कला-संस्कृति से जुड़ी गतिविधियों के लिए भी जाने जाते हैं. कला-संस्कृति और साहित्य को आम लोगों तक पहुंचाने और उनसे जोड़ने के लिए वो 'पासबान-ए- अदब-मुंबई' और 'जश्ने अदब -दिल्ली'नाम से लिटरेरी मूवमेंट चलाते हैं. 21 अगस्त से 24 अगस्त तक दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 'जश्ने अदब' का चार रोजा प्रोग्राम का आयोजन किया गया, जहाँ देश के मशहूर- मारूफ अदीबों और आर्टिस्टों को अपनी रचना और कला का प्रदर्शन करने के लिए बुलाया गया. सोमावर को 'जश्ने अदब' तकरीब का आखिरी दिन था. इस मौके पर जश्ने अदब के संरक्षक आईपीएस कैसर खालिद से एक आईपीएस के शायर और लेखक बनने के सफ़र और कला-साहित्य से उनके जुड़ाव को लेकर बातचीत की गई.
सवाल- लॉ एंड आर्डर संभालने वाले एक आईपीएस के अंदर कला-संस्कृति और साहित्य को लेकर इतनी दिलचस्पी, आग्रह और प्रतिबद्धता कैसे पैदा हुई ? उर्दू अदब से लगाव की क्या वजहें रही हैं?
जवाब- उर्दू से बचपन से लगाव था, और ये घर के माहौल में रची-बसी थी. मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई एक सरकारी स्कूल में उर्दू मीडियम में हुई थी. मैंने संघ लोक सेवा आयोग के इम्तिहान में भी उर्दू को एक ऑप्शनल सब्जेक्ट के तौर पर रखा था. इस तरह अपनी मादरी जुबान में दिलचस्पी होना नेचुरल चीज़ है. आप दुनिया भर की जुबान सीखें और बोलें, लेकिन अपनी मादरी जुबान से जो मुहब्बत होती है, उससे इंसान चाहकर भी दूर नहीं हो सकता है. मैं भी अपनी जुबान और मुल्क की सकाफत से मुहब्बत करता हूँ. हम सब की ये इज्तेमाई जिम्मेदारी है कि अपनी भाषा,कला और संस्कृति की हिफाज़त करें, और उसे नई नस्ल तक पहुंचाएं.उनके अंदर इनके प्रति एक बेदारी और जुड़ाव पैदा करें.उन्हें देश की विविधता पर गर्व कराना सिखाएं.
सवाल- एक पुलिस अफसर की अदबी ज़िंदगी की शुरुआत कैसे हुई ?
जवाब- पहली बार 2005 में मशहूर शायर सैयद मोहम्मद अली शाद अज़ीमाबादी के पोएट्री कलेक्शन को एडिट किया था, यहीं से लेखन की शुरुआत हुई थी. पहला पोएट्री कलेक्शन 'शऊर-ए-असर' 2014 में पब्लिश हुआ, जिसे काफी पसंद किया गया. इस किताब के लिए महाराष्ट्र स्टेट साहित्य अकादमी अवॉर्ड भी मिला, जिससे हौसला मिला. इसके बाद दूसरा पोएट्री कलेक्शन 'दश्त-ए-जान' 2016 में पब्लिश हुआ. तीसरी किताब है 'नज़राना'. कुछ दीगर किताबें भी पब्लिश होने की कतार में हैं.
सवाल- आपके लेखन का मौज़ू क्या है?
जवाब- मेरा प्रोफ़ेशन ज़िंदगी में एक मकसद और मिशन देता है. समाज में शांति कायम रखने और लोगों को इंसाफ़ दिलाने में मदद करता है. मेरी तखलीक भी इसी का एक हिस्सा है. सच कहें तो, मेरी रचनाएं मेरी ड्यूटी और फ़र्ज़ की एक तरह से शाब्दिक अभिव्यक्ति या उसका विस्तार है, जिसमें नाइंसाफी, जुर्म- ज्यादती, गैर-बराबरी के प्रति विद्रोह का भाव और मानवीय चेतना, संवेदना, प्रेम-विग्रह और इंसानी रिश्तों के विछोह का प्रलाप है.
सवाल- एक पुलिस अधिकारी के सामने लेखन की क्या चुनौतियाँ हैं?
जवाब- मेरी ज़्यादातर रचनाएं एक पुलिस अफसर के तौर पर अपने निजी तजुर्बों की बुनियाद पर गढ़ी गई है. एक पुलिस वाले की पूरी ज़िंदगी समाज और इंसानों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है. उसके सामने रोज़ नए मसले आते रहते हैं, जिनका वो बारीकी से ओब्ज़र्वेशन करता है. उसे समझता है. उसके होने की वजह तलाश करता है. अगर वो लिखकर इसे एक्सप्रेस कर सकता है, तो हर घटना और हर केस अपने आप में एक रचना हो सकते हैं. लेकिन वो उसे व्यक्त करने में समर्थ नहीं है. इसलिए एक पुलिस अधिकारी के पास विषयों की उपलब्धता होते हुए भी एक्सप्रेशन की चुनौतियाँ रहती हैं.
सवाल- कला और साहित्य की बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं, इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?
जवाब- कला और साहित्य की सबसे बड़ी चुनौतियाँ ओरिजिनालिटी की हैं. इसके मानक और मूल स्वरूप को बनाए रखने की है. दूसरी चुनौती नौजवान नस्ल को इससे जोड़े रखने की है. इसके लिए कला और साहित्य से जुड़े लोगों को और ज्यादा सम्मान देने, उन्हें नए मौके मुहैय्या कराने और उनके लिए अर्थ की व्यवस्था करने की ज़रूरत है. इसके साथ ही इसके लिए जंगी सतह पर मुहिम और तहरीक चलानी होगी.
सवाल- आपका साहित्योत्सव 'जश्न-ए-अदब' क्या है, इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई?
जवाब- साहित्योत्सव जश्न-ए-अदब मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब, और अपनी समृद्ध कला-संस्कृति और भाषाई विविधता की विरासत का जश्न मनाने, उसे सहेजने, उसका प्रचार-प्रसार करने और आम लोगों को उससे जोड़ने की एक छोटी-सी कोशिश के तौर पर शुरू की गई थी, जो अब मुल्कगीर सतह पर एक तहरीक बन गई है. इसकी शुरुआत 2012 में मुंबई से हुई थी, और पहले ही साल इसकी शानदार कामयाबी को देखते हुए 2013 में इसके दिल्ली चैप्टर की शुरुआत की गई थी, तब से मुसलसल हमारा कारवां बढ़ता जा रहा है.
सवाल- साहित्य उत्सव जश्न-ए-अदब कैसे काम करता है?
जवाब- साहित्य उत्सव जश्न-ए-अदब का मुल्क के अलग-अलग शहरों में लगातार आयोजन किया जाता है. कला,साहित्य,संगीत,थिएटर, लोक परंपराओं का ये एक जीवंत प्लेटफॉर्म है, जो सबको एक साथ लाता है और उन्हें आपस में जोड़ता है. यहाँ म्यूज़िकल परफॉर्मेंस, कवि सम्मेलन, मुशायरा, पैनल डिस्कशन, बुक रीडिंग, सूफ़ी और क्लासिकल म्यूज़िक, क्लासिकल और लोक डांस, नाटक, कहानी और दास्तानगोई की जाती है. ये प्लेटफ़ॉर्म कवियों, लेखकों, विद्वानों, संगीतकारों, डांसरों, थिएटर कलाकारों और सांस्कृतिक विचारकों की अभिव्यक्ति और बौद्धिक विमर्श का मरकज है. ये मंच मुल्क के लाखों लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ रहा है.
सवाल- साहित्य उत्सव जश्न-ए-अदब का कोर वैल्यू क्या है, ये पहले से मौजूद कला-संस्कृति से जुड़े संगठनों और तहरीक से कैसे अलग है ?
जवाब- हमारा मिशन अवाम को मुल्क की समृद्ध कलात्मक विरासत और उसकी विविधता से रूबरू कराना है. हम रचनात्मकता को बढ़ावा देने, बौद्धिक विमर्श को को फरोग देने, और यह सुनिश्चित करने के लिए पाबन्द अहद हैं कि भारत की कलात्मक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों के लिए जिंदा-जावेद, रेलीवेंट प्रासंगिक और सर्व सुलभ बनी रहें. हमारी पीढ़ी अपनी कला और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना सीखे और उससे जुड़ी रहे. हमारा मकसद कवियों, लेखकों, कलाकारों, संगीतकारों, विद्वानों और दर्शकों को एक जीवंत मंच पर एक साथ लाना उभरते और स्थापित कलाकारों को अपनी आवाज और प्रतिभा को साझा करने के लिए एक समावेशी मंच प्रदान करना है. हम शास्त्रीय और लोक कलाओं को पुनर्जीवित करने और सांस्कृतिक कारवां विरासत पहल के जरिये पूरे मुल्क में सांस्कृतिक आंदोलन चला रहे हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ.
सवाल- क्या आपको लगता है कि जो काम जश्न-ए-अदब कर रहा है, वो पहले से कोई और इदारा या तंजीम नहीं कर पा रही थी?
जवाब- बिल्कुल कर रहा है. मुल्कगीर सतह पर ये काम होते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद इसमें तमाम अदबी और कल्चरल तंजीमे या इदारे उस सतह पर कामयाब नहीं हुए हैं, जितनी उनसे उम्मीद की जाती रही है. इसके अलावा देश में कला-संस्कृति से जुड़े प्रोग्रामों और विमर्शों का स्टैण्डर्ड भी लगातार गिरता जा रहा है. कला-संस्कृति के नाम पर अवाम के सामने कुछ भी परोसा जा रहा है, जो हमारा नहीं है. हमारी विरासत का हिस्सा नहीं है. नौजवान पीढ़ी अपनी जड़ों से कटती जा रही है. अपनी भाषा-संस्कृति और लोक कलाओं से खुद को कनेक्ट नहीं कर पा रही है. हम उन्हें जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
सवाल- नौजवान पीढ़ी आखिर अपनी जड़ों से क्यों कट रही है? क्या मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम या तरक्की का वेस्टर्न मॉडल इसके लिए जिम्मेदार है?
जवाब- नहीं, बिल्कुल नहीं! इसके लिए हमारी सामूहिक सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय जिम्मेदारी के भाव का अभाव जिम्मेदार है. समाज का जब एक सामान्य आदमी पढ़- लिखकर किसी ओहदे पर पहुँच जाता है, तो वो अपने से पीछे छूटे हुए इंसान को भूल जाता है. बड़ी और प्राइमरी जिम्मेदारियों को पूरी करने में अपनी सामाजिक जिम्मेदारियां भूल जाता है. हिंदी या उर्दू बोलने वाला आदमी इंग्लिश सीखकर पॉप संगीत, हिप-हॉप और रैप कल्चर को तो फॉलो करने लगता है, लेकिन अपने ही कला-संस्कृति और भाषा से वो नज़रे चुराने लगता है. वो उसे एक बाधा और बोझ लगने लगता है. हम कुछ भी पढ़ें, दुनिया का कोई भी पेशा अपनाएं और कहीं भी रहें, लेकिन हमें अपने कला और संस्कृति पर गर्व करना सीखना होगा, उससे जुड़े रहना होगा. वो हमारी असल पहचान है; जिस दिन इसे छोड़ देंगे, अपनी जड़ों से कट जाएंगे। नौजवान पीढ़ी को इससे रूबरू कराना और जोड़ना आज वक़्त की ज़रूरत है.
सवाल- मुस्लिम समाज मुल्क की कला और संस्कृति से क्यों दूर है? उन्हें इससे कैसे जोड़ा जाए?
जवाब- आपके इस नज़रिए से मैं इत्तेफाक नहीं रखता हूँ. कला-संस्कृति और साहित्य ही ऐसा शोबा है, जहाँ मुसलमान अपनी आबादी के तनासुब से कहीं ज्यादा अपना प्रतिनिधित्व रखता है. फिल्मों में तो एक वक़्त इस समाज का दबदबा रहा है. इसके अलावा भी कला के सभी रूपों में इस समाज की अच्छी खासी हिस्सेदारी है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान,उस्ताद जाकिर हुसैन, अमजद अली खान, एमएफ हुसैन,बेगम अख्तर, एआर रहमान और साहित्य के ऐसे सैकड़ों नाम हैं, जो भारतीय कला-साहित्य और संस्कृति को समृद्ध करने का काम किया है.हाँ, इतना ज़रूर है कि नृत्य कला में मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व नहीं है, और मज़हबी ममानियत की वजह से यहाँ लड़कियों की हिस्सेदारी भी न के बराबर है. लेकिन कला के दीगर शोबों में इस समाज की हिस्सेदारी काबिल-ए-तारीफ़ है.