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Lok Sabha Elections 2024: आगामी लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर सभी पार्टियां अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गई हैं. सत्तारूढ़ भारती जनता पार्टी ने 2 मार्च को 195 कैंडिडेट्स के नामों की पहली सूची जारी की थी. इसके बाद कांग्रेस ने 8 मार्च को 39 उम्मीदवारों में की पहली लिस्ट जारी की. अब बंगाल में टीएमसी ने सभी 42 सीटों पर अपने कैंडिडेट्स का ऐलान किया है. टीएमसी पूर्व क्रिकेटर युसुफ पठान को बहरामपुर से चुनावी मैदान में उतारा है. बीजेपी ने पहली लिस्ट में भोजपुरी गायक व अदाकार पवन सिंह को टिकट दिया था. बीजेपी ने उन्हें आसनसोल से प्रत्याशी बनाया था. हालांकि, बाद उन्होंने इस सीट से चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. लेकिन इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर सियासी पार्टियां कलाकारों, खिलाड़ियों और मशहूर हस्तियों को को उम्मीदवार क्यों बनाते हैं? आइए जनते हैं इस सवाल के जवाब में राजनीतिक विश्लेषक और जानकारों का क्या मानना है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर राजेश मिश्र का दावा है कि सियासी पार्टियां संकट के दौरान या फिर अपनी सीट बढ़ाने के लिए सिनेमा जगत के कलाकारों का सहारा लेते हैं.लोकसभा चुनाव 2024 के लिए उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अभी तक चार मौजूदा सांसदों हेमा मालिनी (मथुरा), पूर्व टीवी अभिनेत्री स्मृति ईरानी (अमेठी), अभिनेता रवि किशन (गोरखपुर) और दिनेश लाल यादव निरहुआ (आजमगढ़) को फिर से प्रत्याशी बनाया है. वहीं, समाजवादी पार्टी (सपा) ने अभिनेत्री काजल निषाद को गोरखपुर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है.
जब अमिताभ बच्चन ने सीएम को हराया था...
इसके अलावा टीएमसी ने बॉलीवुड अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को आसनसोल संसदीय सीट से दोबारा कैंडिडेट बनाया है. जबकि हुगली सीट से पार्टी अभिनेता रचना बनर्जी और बर्धवान से पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आज़ाद को टिकट दिया है. यह पहली बार नहीं हुआ है सियासी पार्टियों ने किसी क्रिकेटर और एक्टर को टिकट दिया है. इससे पहले पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने इलाहाबाद लोकसभा सीट पर देश के दिग्गज नेता और यूपी के पूर्व सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ एक्टर अमिताभ बच्चन को उतारा था. जनता ने उस चुनाव में बहुगुणा की जगह अमिताभ बच्चन पर भरोसा जताया था. उस चुनाव में बच्चन को दो लाख 97 हजार से ज्यादा वोट मिले थे जबकि बहुगुणा को एक लाख 10 हजार से भी वोट पड़े थे.
इसके अलावा समाजवादी पार्टी ने साल 1996 में पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ लखनऊ सीट से एक्टर राज बब्बर को उतारा और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध साल 2009 में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में अभिनेता-गायक मनोज तिवारी को चुनावी मैदान में उतारा, लेकिन इन दोनों कलाकारों को हार मिली. हालांकि, मनोज तिवारी साल 2014 और 2019 में भाजपा की टिकट से जीत कर संसद पहुंचे. अब पार्टी ने फिर से तीसरी बार चिकट दिया है. वहीं, राज बब्बर भी बाद में साल 1999 और 2004 में आगरा सीट से सपा से और 2009 में कांग्रेस के टिकट पर फिरोजाबाद से जीतकर संसद पहुंचे.
विश्लेषकों ने क्या कहा?
लखनऊ यूनिवर्सिटी के रिटायर प्रोफेसर डॉक्टर राजेश मिश्रा ने कहा, "चुनावी रणनीति में लोकप्रियता का बहुत महत्व है, लेकिन जो भी राजनीतिक दल इनको (फिल्म जगत के कलाकारों को) मौका देते हैं, उन दलों में आत्मविश्वास की कमी जरूर होती है." डॉक्टर मिश्रा ने आगे कहा कि सियासी पार्टियां संकट में या फिर अपनी सीट बढ़ाने के लिए ऐसे मशहूर चेहरों का सहारा लेते हैं और यह बहुत पुरानी परंपरा है. प्रोफेसर राजेश मिश्रा ने जोर देकर कहा, "उनका (अभिनेता-अभिनेत्रियों का) कोई सियासी कीमत नहीं है, लेकिन उनकी उम्मीदवारी से आसपास की सीट पर भी प्रशंसकों का झुकाव उनसे जुड़े पार्टी की तरफ होता है और उनको मौका मिलने की एक बड़ी वजह यह भी होती है."
‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ एंड ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ की उत्तर प्रदेश इकाई के चीफ कोऑर्डिनेटर संजय सिंह ने कहा, "मुझे लगता है कि कलाकार को मजहब के साथ नहीं जोड़ना चाहिए. कलाकार मजहब से ऊपर होते हैं और अगर सियासी पार्टी कलाकारों की कला को भूलकर उनकी जाति का उपयोग करते हैं तो यह सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है."