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मोहम्मद सुहैल : पिछली गई दहाइयों से अपनी आवाज़ का जादू बरकरार रखने वाली आशा ताई का नाम फिल्मी दुनिया की अज़ीम गुलूकाराओं में सरे फहरिस्त लिया जाता है. उम्र के इस पड़ाव में आज भी उनकी आवाज़ में वही नटखट, चंचलता है जिसका कोई सानी नहीं है. आशा ताई का आज यौमे पैदाईश है. हम इस मौके पर ताई की ज़िंदगी से मुतअल्लिक कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं.
आशा ताई के इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के पीछे इनकी जद्दोदहद को कभी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है. इनके वालिद मास्टर दीना नाथ की अचानक मौत के बाद इनके परिवार पर मुसीबतों का ऐसा पहाड़ टूटा कि इनको खाने तक को लाले पड़ गए थे. यहां तक कि इनकी मां को अपने गहने तक भी बेचने पड़ गए थे. यही वजह है कि मजबूरन इनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर को बहुत कम उम्र में ही फिल्मों में अदाकारी और गुलूकारी का छोटा-छोटा काम करना पड़ा.
नन्हीं आशा परिवार का ये सब हाल देखा करती थी. वो भी चाहती थी कि मैं भी किसी तरह अपने परिवार की मदद कर सकूं. इसी सिम्त में उनकी कोशिशें जारी रहीं और उन्हें कामयाबी भी मिली. जिसकी वजह से उन्हें महज़ 10 बरस की उम्र में एक मराठी फिल्म में गाना गाने का मौके मिला. इसके बाद साल 1948 में आई फिल्म 'चुनरिया' में भी आशा ताई ने गाना गाया. महज़ 10 बरस की उम्र में भी आशा ताई की आवाज़ में एक अगल ही खनक थी.
आशा जब 16 बरस की थीं तो उनकी शादी गनपत राव भौसले से हो गई थी. इस शादी के बाद से आशा मंगेशकर आशा भौसले कहलाई जाने लगीं. लेकिन किन्हीं वुजूहात के चलते ये शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी. जिसके बाद इन पर एक बार फिर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. मुसीबतों के इस दौर में आशा ताई की ख्वाहिश थी कि उन्हें फिल्मों में गाने का मौका मिल जाए ताकि वो अपना गुज़र बसर कर सकें लेकिन उस वक्त गीता दत्त, शमशाद बेगम, खुद इनकी बहन लता मंगेशकर जैसी अज़ीम गुलूकाराओं का दौर चल रहा था. जिसकी वजह से इनको बहुत कम काम मिला करता था और वो भी कम बजट की फिल्में हुआ करती थी. जिसके चलते इन्हें गाने के पैसे भी बहुत कम मिलते थे.
शुरूआती दौर में संग दिल, परीनीता जैसी फिल्मों में इन्हें कुछ नग्मे गाने का मौका मिला, लेकिन कुछ बात नहीं बन पा रही थी. साल 1954 में इनकी जद्दोजहद रंग लाई जब राजकपूर और शंकर-जय किशन ने इन्हें फिल्म 'बूट पॉलिश' में नग्में गाने का मौका दिया. इस फिल्म में आशा की आवाज़ में गाए नग्मों की वजह से आशा हिंदुस्तान में मशहूर हो गईं. उसके बाद साल 1956 में CID फिल्म आई, इस फिल्म में इनको मशहूर मौसीकार ओपी नय्यर का साथ मिला. इस फिल्म के एक नग्मे 'ओ लेके पहला-पहला प्यार' ने खूब धूम मचाई. इसी फिल्म के बाद से ओपी नय्यर और आशा की जोड़ी ने फिल्म इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक नग्मे दिए. जैसे- फिल्म 'हावड़ा ब्रिज', 'एक मुसाफिर एक हसीना', 'नया दौर', 'मेरे सनम', 'कश्मीर की कली', 'किस्मत' जैसी फिल्मों ने मकबूलियत के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए.
आशा की इस मकबूलियत के बाद वो अपने ज़माने की किसी गुलूकारा से पीछे नहीं रह गई थीं. उस वक्त के मशहूर मौसीकार सचिन देव बर्मन, शंकर जय किशन, रवि, जयदेव और बहुत से अज़ीम मौसीकारों के लिए दरवाज़े खुल गए थे. इसी मकबूलियत के दौरान में उनको सचिन बर्मन के बेटे राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) के साथ एक से बढ़कर एक मकबूल नग्मे दिए. ये जोड़ी भी इतनी हिट रही कि हकीकी ज़िंदगी में इन दोनों के तार जुड़ गए और दोनों ने शादी भी करली. यह शादी बेहद कामयाब रही लेकिन शादी के कुछ सालों बाद ही आरडी बर्मन इस दुनिया को अलविदा कह गए थे.
आशा भौसले का नाम लिए बगैर आज भी हिंदुस्तानी गुलूकारी अधूरी रह जाती है. उसकी वजह यह है कि आज भी जब वो कभी गाती हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई नौजवान लड़की गा रही हो.