)
ए निशांत/नई दिल्ली: द्रविड़ राजनीति ने तमिलनाडु को एक से बढ़कर एक राजनेता दिया पेरियार, सी.राज राजगोपालाचारी, के.कामराज ,सी अन्नादुरई, एमजीआर, करुणानिधि और जयललिता.
इन्होंने राजनीति में नई लकीर खींच कर नया मानदंड स्थापित किया. इतने पुरुष नेताओं के बीच में केवल जयललिता ही एक ऐसा प्रभावशाली नाम हैं, जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता से कई पुरानी धारणाएं ध्वस्त कर खुद को प्रदेश की राजनीति तक ही नहीं सीमित रखा, बल्कि अपने निर्णयों और राजनीतिक सूझबूझ की बदौलत खुद को केंद्रीय राजनीति में भी प्रासंगिक बनाए रखा.
राजनीतिक जीवन
अपने समर्थकों में अम्मा के नाम से लोकप्रिय जयललिता के जीवन के दो हिस्से हैं. एक भाग में वह सफल अभिनेत्री रही, तो दूसरे में दमदार राजनीतिज्ञ. जयललिता ने अपने जीवन में कई रंग देखे, सफलता, असफलता, संघर्ष अपमान, आरोप और उसके बाद असीम लोकप्रियता.
इन सब परिस्थितियों ने जयललिता के व्यक्तित्व को सशक्त बना दिया, जो किसी भी विपरीत हालात में विचलित नहीं होती थीं. करुणानिधि जैसे मंजे हुए राजनीतिक प्रतिद्वंदी के समनांतर राजनीति करना सिर्फ जयललिता के बस की ही बात थी, जिन्होंने अपने सधे चाल से विरोधियों को हर बार चित्त कर छह बार तमिलनाडु की सत्ता पर खुद को विराजमान किया.
1982 में एमजी रामचंद्रन ने जयललिता का सक्रिय राजनीति में प्रवेश करा उन्हें राज्यसभा भेजा. 1987 में MGR के निधन के बाद जयललिता ने खुद को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर, तमिलनाडु की पुरुष प्रधान राजनीति में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई.
25 मार्च 1989 को तमिलनाडु विधानसभा में बजट सत्र के दौरान विधानसभा में डीएमके के विधायकों द्वारा इनके साथ धक्का-मुक्की की , इस अपमान से आहत जयललिता फटी हुई ही साड़ी में मीडिया के सामने आईं और खुद के साथ हुई वारदात की तुलना द्रौपदी के चीरहरण से की. जयललिता ने मुख्यमंत्री बनने के बाद ही विधानसभा में प्रवेश करने का प्रण लिया. तब मीडिया और राजनेताओं के एक वर्ग ने इसे सस्ती लोकप्रियता बताया, मगर जयललिता ने इस मुद्दे को आम जनता में खूब भुनाया. लिट्टे विद्रोहियों द्वारा वर्ष 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी परिस्थितियों में ,राज्य में हुए चुनावों में उनकी पार्टी एआईडीएमके ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और और अपनी जीत दर्ज कराई. उसके बाद वह 1991 से 1996 तक राज्य की पहली सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री रहीं.
लोकप्रियता
जयललिता अपने खास अंदाज की राजनीति कर काफी कम समय में किसान, महिलाओं और पिछड़ों में काफी लोकप्रिय हो गईं. घर-घर रंगीन टीवी देने की योजना, महिलाओं के लिए स्कूटर सब्सिडी, गर्भवती महिलाओं के लिए स्पेशल मेटरनिटी स्कीम जैसी योजनाओं ने उनको हर वर्ग का चहेता बना दिया. सरकार और पार्टी पर एकाधिकार कर कुशल प्रशासन चलाने के तरीके ने उनकी जनप्रियता को आमजनों की जुबान पर ला दिया. उनके अम्मा कैंटीन योजन की प्रशंसा प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन तक कर चुके हैं.
राजनीतिक आरोप एवं विवाद
एमजीआर की मृत्यु के बाद अगर जयललिता का कोई सबसे करीबी था तो वह शशिकला थी, जो पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चिनम्मा के नाम से जानी जाती थी.
शशिकला का राजनीतिक दखल जयललिता के हर महत्वपूर्ण फैसले पर रहा, वह पर्दे के पीछे से पार्टी और सरकार संचालित करती रहीं. जयललिता ने शशिकला के ही रिश्तेदार वीएन सुधाकरन को अपना दत्तक पुत्र बना लिया. सुधाकरन की शादी में हुई शाही खर्च काफी भर्त्सना हुई. इसकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी हुई कि 1996 में जयललिता स्वयं पहली बार चुनाव हार गई.
1998 में उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए को समर्थन दिया, पर कुछ मतभेदों के चलते अपना समर्थन वापस भी ले लिया.
जयललिता पर राजनीतिक बदले का आरोप अक्सर लगते रहा हैं. वर्ष 2002 में जब आधी रात को दिग्गज राजनेता करुणानिधि को जगा कर गिरफ्तार किया गया, तो उसकी काफी सार्वजनिक निंदा हुई. आय से अधिक संपत्ति के मामले में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और तब उन्हें अपने विश्वस्त सहयोगी ओ पनीरसेल्वम को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर चुना.
व्यक्तिगत जीवन
जयललिता की जीवनी अम्मा: जर्नी फ्रॉम मूवी स्टार टू पॉलीटिकल क्वीन लिखने वाली वासंती के मुताबिक,
24 फरवरी 1948 को जन्मी जयललिता का जीवन सामान्य से हटके रहा. 15 साल की ही उम्र में फिल्मी दुनिया में प्रवेश करने वाली जयललिता आजीवन शादी नहीं की,पर एमजी रामचंद्रन से उनका रूहानी रिश्ता रहा. जयललिता ने अपने व्यक्तिगत जीवन में काफी कुछ देखा, सुना और सहा. कई गंभीर बीमारियों से गुजरते हुए 5 दिसंबर 2016 को उनका निधन हो गया.
पिछले वर्ष रिलीज हुई कंगना राणावत द्वारा अभिनीत जयललिता के जीवनी पर बनी फिल्म थालइवी काफी चर्चा में रही.
-ऐ निशांत
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
Video: