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Zee SalaamIndian Muslimएक ऐसा महीना जिसमें मुसलमानों का ख़ामोश रहना, सोना और मुस्कुराना भी है इबादत

एक ऐसा महीना जिसमें मुसलमानों का ख़ामोश रहना, सोना और मुस्कुराना भी है इबादत

Ramadan 2025: एक ऐसा महीना जिसमें रोज़ा रखना इबादत है, ख़ामोश रहना भी इबादत है, सोना भी इबादत है और मुस्कुराना भी इबादत है. आइये जानते हैं वह कौनसा महीना है.

एक ऐसा महीना जिसमें मुसलमानों का ख़ामोश रहना, सोना और मुस्कुराना भी है इबादत

Ramadan 2025: रमज़ान रहमतों के ख़ज़ाने लेकर एक बार फिर हमारी ज़िंदगी में आ गया, दिल में अजीब सी ख़ुशी है और ये ख़ुशी शाबान के महीने से ही महसूस हो रही है, शाबान का चांद तुलू होते ही रमज़ान की ख़ुशबू आने लगती है, दिल में ख़ुशी के जज़्बात उमड़ने लगते हैं और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगला महीना रमज़ान हमारी ज़िदंगी में एकबार फिर रहमतों, बरकतों, मग़फ़िरतो और साअतों के ख़ज़ाने लेकर आ रहा है.

कितने ही लोग हैं जो हमारे साथ गुज़िश्ता साल इबादत कर रहे थे मगर आज वो दुनिया में मौजूद नही हैं, मस्जिदों में नही हैं बल्कि क़ब्रिस्तानों में हैंऔर बहुत से ऐसे लोग हैं जो जिस्मानी, ज़ेहनी या जईफ़ी के सबब रोज़े रखने से आजिज़ हैं और बड़े ख़ुशनसीब हैं वो हज़रात जिन्हे इसबार भी रोज़े रखने की साअदत हासिल हो रही है रमज़ान से इस्तेफ़ादा करने का मौक़ा मिल रहा है.

आसमान से रहमतों की बारिश,ज़मीन वालों पर हर लम्हा नवाज़िश,मासूम मलाएका का नुज़ूल,आसियों के लिए मग़फ़िरत के परवाने तक़सीम, नेकी करने वालों के दर्जात में बलंदी की बशारतें,सहरी के ईमां अफ़रोज़ लम्हात, इफ़्तार की बाबरकत घड़ियां,दुआओं की क़ुबूलियत की साअतें,तिलावते कलाम से गूंजती फ़िज़ाएं,नाते मुस्तफ़ा पर लोगों का झूमना, हालते रोज़ा में दिलों का जगमगाना, मस्जिदों में नमाज़ियों का जम्मे ग़फ़ीर, सदक़ात,ख़ैरात और ज़कात का तक़सीम होना, कोई इशारा मिल रहा है, दिल गवाही दे रहा है, ख़ुशू और ख़ुज़ू बढ़ता चला जा रहा है,इबादतों का शौक़ो ज़ौक़ बढ़ता जा रहा है,यक़ीनन यक़ीनन करीम महीना जलवा अफ़रोज़ हो चुका है, करीम परवरदिगार के दर से करीम नबी और उनके अहलेबैत के सदक़े में रमज़ान करीम तशरीफ़ लाया है

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रमज़ानुल मुबारक की तमाम फ़ज़ीलतों का ज़िक्र करते हुए सहाबिए रसूल हज़रत सलमाने फ़ारसी कहते हैं कि 'शाबान के आख़िरी अय्याम में सरकारे दो आलम ने एक ख़ुत्बा देते हुए फ़रमाया कि ऐ लोगो तुम पर बड़ी अज़मतो बरकत वाला महीना आ रहा है,लिहाज़ा तुम्हारा हर नेक अमल दीगर महीनो के फ़र्ज़ के बराबर होगा'.

इस मुबारक महीने के लिए 14 सौ साल पहले मस्जिदे नबवी के बलंद मेंबर से हज़रत मुहम्मदे मुस्तफ़ा स.अ. ने अपनी उम्मत को यह ख़ुशख़बरी सुनाई थी 'कि ऐ लोगो ख़ुदा का महीना बरकत, रहमत और मग़फ़िरत के साथ तुम्हारी तरफ़ आ रहा है, ये महीना ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन महीना है,इसके अय्याम बेहतरीन अय्याम हैं, इसकी शबे बेहतरीन शबे हैं, इसकी घड़ियां बेहतरीन घड़ियां हैं, तुम्हारी सांसे ज़िक्रे ख़ुदा में पढ़ी जाने वाली तस्बीह का सवाब रखती हैं, तुम्हारी नींदे इबादत, आमाल मक़बूल और दुआएं मुस्तेजाब हैं, लिहाज़ा इस महीने से ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेफ़ादा करो' सरकारे मदीना के इस ख़ुत्बे के तनाज़ुर मे देखा जाए तो रमज़ान इन फ़ज़ीलतों की बहार लेकर हमारी ज़िदंगियों में हर साल आता है. यही वजह है कि सिर्फ़ इबादतगाहें ही नही बल्कि ज़िदंगी का हर शोबा इससे पुरनूर और बारौनक़ रहता है.इस महीने में सिर्फ़ मस्जिदे और इबादतगाहें ही आबाद नही होती बल्कि घर, बज़ार और अवामी जगहों पर भी इसकी रौनक़ ख़ास तौर पर देखी जाती है....रमज़ान के इस बाबरकत महीने में हर तरफ़ रौनक छायी रहती है.

रोज़ा इस्लाम की एक अहम इबादत है, इस्लाम के पांच अरकान में से एक रुक्न है, रमज़ानुल मुबारक की इन मुबारक घड़ियों का एक लम्हा भी ज़ाया ना जाने दें, यू तो तमाम इबादते इस्लामी अल्लाह की रज़ा के अलावा भी बेशुमार ख़ुसूसियात की हामिल है, ऐसा मुम्किन नही कि आदमी इबादते इस्लामी को शऊरी तौर पर अदा करे और उसके असरात रुहानी और जिस्मानी तौर पर महसूस न करे, इबादते इस्लामी क़ल्बो जेहन की तस्कीन और जिस्मानी तक़वियत का ज़रिया है, इबादते इस्लामी क़ुरतबे इलाही का ज़रिया है,रोज़ा भी एक अज़ीमुश्शान इबादत है, इस इबादत के असरात हर शोबे पर पड़ता है, रोज़ा इबादते इलाही की दावत तो देता ही है, साथ ही इस महीने में माअशी और इक़्तेसादी सरगर्मियां बढ़ जाती हैं, इस महीने की तमाम बरकात और समरात से कौन वाक़िफ़ नही है, इन तमाम एहतेमाम के साथ रोज़ा रखना ऐसी इबादत है कि इसमे ख़ामोश रहना भी इबादत है, सोना भी इबादत है, मुस्कुराना भी इबादत है
 
अल्लाह तअला ने अपने बंदो पर रमज़ान के रोज़े इस लिए फ़र्ज़ किए हैं, ताकि इन्हे तक़वे की दौलतो नेमत हासिल हो, तक़वा ये कि इंसान इस दुनिया में अपने रब का बंदा और उसका फ़रमाबरदार बन कर रहे, रोज़े की हक़ीक़त सामने रखने से हमारी महदूद अक़ल भी ये समझ लेती है कि तक़वे के हुसूल के लिए ये इबादत मोअस्सरतरीन तदबीर है, रमज़ानुल मुबारक इस्लामी साल का नवां महीना है, अपनी अज़मतो बरकत के लिहाज़ से ये तमाम महीनो से मुमताज़ है, इसी महीने में अल्लाह ताला की किताब क़ुरान मजीद का नुज़ूल लौहे महफ़ूज़ से आसमाने दुनिया पर हुआ, इस महीने की आमद के लिए नबी करीम (स.अ.) रजब और शबान से ही दुआएं मांगने लगते थे, इस महीने में सरकारे मदीना ख़ूब सख़ावत और इबादत में मशग़ूल रहा करते थे, रमज़ान में अल्लाह तअला ने बेशुमार इनामात, फ़ज़ाएलो बरकात रखे हैं, इस महीने के रोज़े आख़िरत में दोज़ख़ से निजात का ज़रिया बनेंगे

नमाज़ रोज़ाना की इबादत है, जबिक रोज़ा सालाना की इबादत है, जिसके लिए अल्लाह तअला ने रमज़ानुल मुबारक का महीना मुंतख़ब किया, और इसे दूसरे तमाम महीनों पर फ़ज़ीलत बख़्शी,अल्लाह बुज़ुर्गो बरतर से दुआ है कि वो रमज़ान में ख़ुलूसे नियत के साथ कसरत से नेकिया करने और बुराईयों से बचने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, शऊरे इबादत के ज़रिए माहे स्याम की रहमतों और बरकतों से भरपूर इस्तेफ़ादा किया जा सके

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