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नई दिल्ली: असम की भाजपा नीत हेमंत विस्वा शर्मा सरकार 42 साल पुराने असम के नेल्ली नरसंहार की फाइल एक बार फिर खोलने जा रही है. मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा शर्मा ने कहा है कि वो इस नरसंहार की रिपोर्ट को असम के अगले विधानसभा सत्र में पेश करने जा रही है. हालांकि, सरकार इस गड़े मुर्दे को 45 साल बाद फिर से क्यों उखाड़ना चाह रही है, इसे साफ़ नहीं किया है? लेकिन राज्य सरकार के इस फैसले से असम के मुसलमानों में एक बार फिर भय और आशंका का माहौल बन गया है. कुछ लोग जहाँ इसे सरकार का सही कदम बता रहे हैं, वहीँ कुछ लोग इसे अगले साल होने वाली विधानसभा चुनाव की तैयारी और राज्य में हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने की साजिश मान रहे हैं.
असम के मियां कल्याण परिषद के राजुल करीम मानते हैं कि नेल्ली नरसंहार में 10000 से भी ज्यादा बंगला भाषी मुस्लिम मारे गए थे. इस वक़्त असम के मुख्यमंत्री ने जोटी.डी. गुप्ता आयोग की रिपोर्ट को जो विधानसभा में पेश करने की बात कह रहे हैं, वह बहुत अच्छी बात है, लेकिन आखिर इसका मकसद क्या है ? क्या मारे गए लोगों को इन्साफ मिलेगा ?
इत्तेहाद फ्रंटअसम के प्रमुख नरुल इस्लाम कहते हैं, "असम के मुख्यमंत्री ने टी.डी. गुप्ता आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में सबमिट करने की बात कर रहे हैं. लेकिन यह सोचने वाली बात है कि अभी 2026 के चुनाव से पहले यह रिपोर्ट पेश करने का क्या मतलब है? इससे राज्य में साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ सकता है. असम के मुख्यमंत्री कुछ दिनों से राज्य में जो भाईचारा देख रहे हैं शायद उससे डर गए हैं. इसीलिए इस तरह से नेल्ली हत्याकांड की फाइल फिर से खोलने जा रहे हैं."
उधर सरकार ने भी अपनी मंशा अभी तक साफ़ नहीं की है कि आखिर रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करना का क्या मकसद है?
आखिर नेल्ली नरसंहार में क्यों मार दिए गए हज़ारों मुसलमान?
असम का नेल्ली नरसंहार 18 फरवरी 1983 को नौगाँव जिले के नेल्ली और आसपास के 14 गांवों में हुआ था. यह देश के भयानक साम्प्रदायिक हिंसा में से एक हिंसा थी. इस नरसंहार में ख़ास तौर से बांग्लादेशी मूल के मुस्लिम आप्रवासियों को निशाना बनाया गया, जिन्हें स्थानीय असमिया और आदिवासी समुदाय अवैध प्रवासी मानते थे. इस नरसंहार की ज़मीन साल 1979 से 1985 के बीच चले 'असम आंदोलन' ने तैयार की थी, जिसका मकसद असम से विदेशियों या अवैध बांग्लादेशियों को खदेड़ना था. इस आन्दोलन का नेतृत्व ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और असम गण परिषद (AGP) ने किया था.
चूंकि बांग्लादेश की सीमा असम से मिली है तो वहां से बड़ी तादाद में घुसपैठिए भी असम आते रहे हैं, जबकि वहां बांगला बोलने वाले बंगाल के लोग भी रहते हैं. कई दशकों से असम में बसे बंगाल के निवासी और बांग्लादेशियों दोनों का मूल पेशा खेती बाड़ी रहा है. लोकल आदिवासी मानते थे कि तिवा समुदाय की जमीन पर कब्जा कर वो लोग खेती कर रहे हैं. वो उनके संसाधनों पर नाहक बोझ हैं.
इसी बीच 1983 में असम में विधानसभा चुनाव कराए गए, जिनका कई संगठनों ने खुलकर विरोध किया, क्योंकि मतदाता सूची में कथित तौर पर अवैध प्रवासियों के नाम भी शामिल किये गए थे. इस तनाव ने हिंसा में घी डालने का काम किया. असम के आदिवासी बांग्लाभाषियों के मतदान में हिस्सा लेने से नाराज थे. 18 फरवरी 1983 को सेंट्रल असम के नेल्ली क्षेत्र में हजारों आदिवासियों ने मिलकर बांग्लाभाषी मुसलमानों के कई गांवों को घेर लिया. इसमें 14 अन्य मुस्लिम बहुल गांवों शामिल थे. दंगाईयों ने गांव की सभी सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया. कई घर को आग के हवाले कर दिया. भागने की कोशिश करने वालों का कत्ल कर दिया और आग में जिन्दा जला दिया. छह घंटे के अन्दर ही दो हजार से भी ज्यादा बंगाली मुसलमानों का सरेआम कत्ल कर दिया गया. गैर सरकारी रिपोर्ट में मरने वालों की तादाद 3 से १० हज़ार तक बताई गई थी. इस नेल्ली नरसंहार में स्थानीय सरकारी मशीनरी और पुलिस के भी शामिल होने का इल्ज़ाम लगाया गया था.
इस नरसंहार ने असं सहित पूरे देश को झकझोड़ कर रख दिया था. सरकार ने इस घटना की जांच के लिए टी.डी. गुप्ता आयोग का गठन किया, लेकिन इसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई. 1985 में असम समझौता हुआ, जिसके तहत अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन की प्रक्रिया शुरू की गई. लेकिन दंगा पीड़ितों, उनके परिवारों को आजतक न कोई इंसाफ मिला न किसी तरह का मुआवजा दिया गया. ये घटना आज भी असम के सामाजिक ताने-बाने पर एक बदनुमा दाग की तरह है, जो समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में शामिल होती रहती है.
रिपोर्ट: गुवाहाटी से शरीफ उद्दीन अहमद
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