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Syed Salar Masood Ghazi and Raja Suhaldev History: उत्तर प्रदेश में हालिया समय में एक समुदाय विशेष को टार्गेट करते हुए सियासत में आगे बढ़ने की कवायद चल रही है. एक तरफ कुछ सियासी पार्टियां बहुसंख्यक समाज को, जबकि कुछ दल देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों, शिक्षण संस्थानों और उनके इतिहास पर आपत्तिजनक बयान देकर सियासी माइलेज हासिल करने की कोशिश की जा रही है.
बीते दिनों ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने उत्तर प्रदेश इकाई प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने मशहूर सूफी सैयद सालार मसूद गाजी की तुलना महाराजा सुहेलदेव राजभर से तुलना करते हुए विवादित बयान दिया. शौकत अली के बयान के बाद प्रदेश की सियासी तपिश बारिश में भी हाई हो गई. शौकत अली के बयान पर पलटवार करते हुए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की.
बहराइच में एक कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए शौकत अली ने सुहेलदेव को लुटेरा बताया था. इसके उलट उन्होंने कहा कि सैयद सालार मसूद गाजी एक मुस्लिम थे और मुसलमानों के खून में इंसाफपरस्ती होती है. शौकत अली ने कहा, "ऐसे समय में जब सुहेलदेव ने अवाम पर अत्याचार किया तो मसूद गाजी ने उससे जंग की. उनके इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि आखिर कौन थे सैयद सालार मसूद गाजी और महाराजा सुहलेदव, जिनको लेकर AIMIM-SBSP आमने सामने हैं. यह दोनों सियासी दल कभी एक दूसरे के सहयोगी हुआ करते थे.
सैयद सालार मसूद गाजी को गाजी मियां या गाजी सैय्यद सालार मसूद भी कहा जाता है. वह 11वीं सदी के एक जंगजू और सूफी थे. उनका जन्म लगभग 1014 या 1015 ईस्वी में अजमेर में हुआ था, लेकिन कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वे मुल्तान में पैदा हुए थे. उनके वालिद गाजी सैय्यद सालार साहू थे, जो महमूद गजनवी की सेना में कमांडर थे. उनकी मां सित्र-ए-मुअल्ला को महमूद गजनवी की बहन बताया जाता है. इस वजह से सालार मसूद महमूद गजनवी के भांजे थे.
सैयद सालार मसूद गाजी के भारत आगमन को लेकर कई तरह के मतभेद हैं. कहा जाता है कि कम उम्र में ही सालार मसूद भारत आए और उन्होंने मुल्तान, दिल्ली जैसे इलाकों पर फतह का परचम लहराया. वह इस्लाम के संदेश को आम लोगों तक पहुंचाना चाहते थे. हालांकि, उनकी बहुत कम उम्र में मौत हो गई. इतिहासकारों के मुताबिक, जब उनकी मौत हुई तो उनकी उम्र महज 16 से 18 साल की थी. 1034 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बहराइच में राजा सुहेलदेव की सेना से जंग करते हुए वे शहीद हो गए.
सैयद सालार मसूद गाजी की मजार बहराइच में बनी, जो आज भी हिंदू- मुस्लिम दोनों के लिए अहम अकीदत का केंद्र है. यहां हर साल जेष्ठ यानी मई-जून के माह में उर्स का आयोजन किया जाता है, जो पूरे उत्तर प्रदेश में 'जेठ मेला' के नाम से मशहूर है. इस मेले में गंगा जमुनी तहजीब का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जहां हर साल बड़ी संख्या में हिंदू मुस्लिम जियारत के लिए पहुंचते हैं.
इस दौरान लोग सैयद सालार मसूद गाजी की याद में 'पलंग पीढ़ी' जैसे प्रतीकात्मक जुलूस निकालते हैं और इबादत करते हैं. यह जगह हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है. हालांकि, बीते साल उत्तर प्रदेश सरकार ने सैयद सालार मसूद गाजी की उर्स पर रोक लगा दिया था. जिसको लेकर काफी विवाद हुआ था. स्थानीय प्रशासन के फैसले के खिलाफ दरगाह इंतजामिया ने लाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की.
दक्षिणपंथी संगठन के लोग उन्हें आक्रमणकारी मानते हैं, जिन्हें राजा सुहेलदेव ने हराया, जबकि अन्य उन्हें धार्मिक योद्धा और शहीद मानते हैं. यही वजह है कि उनके नाम के आगे 'गाजी' इस्तेमाल किया जाता है यानी इंसाफ और धर्म के लिए शहीद होने वाला. उनके जिंदगी की जानकारी फारसी भाषा की किताब 'मीरात-ए-मसूदी' में मिलती है. इस किताब को 17वीं सदी में अब्दुर रहमान चिश्ती ने लिखी थी. इसमें इतिहास और किंवदंतियों दोनों का मिश्रण है.
इतिहासकार जैसे अमीर खुसरो, जियाउद्दीन बरनी, शम्स-ए-सिराज अफीफ और इब्न बतूता ने भी उन्हें 'सिपहसालार मसूद गाजी' के नाम से लिखा है. आधुनिक शोधकर्ता जैसे सुनील कुमार ने अपनी किताब 'द इमर्जेंस ऑफ द दिल्ली सल्तनत' में उनकी जिंदगी और भारत में इस्लाम के शुरुआती प्रभाव पर चर्चा की है. शोधकर्ताओं का मानना है कि उनकी कहानी में इतिहास और लोककथाएं दोनों शामिल हैं.
गाजी मियां का इतिहास सिर्फ बहराइच तक सीमित नहीं है. उत्तर भारत के कई शहरों में उनके नाम से जगहें हैं और वहां मेलों का आयोजन होता है. मेरठ में कुतुबुद्दीन ऐबक ने गाजी मियां का स्मारक बनवाया था, जहां आज भी बड़े जोश-खरोश से मेले के आयोजन किया जाता है. मुरादाबाद जिले के संभल के पास 'नेजे का मेला' आयोजित होता है. बडौं के लखनपुर में भी उनके सफर से जुड़ी जगह है. कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने 18वीं सदी में दरगाह बंद कर दी थी, जिससे लोग नाराज़ हुए और उन्होंने अपने शहरों में गाजी मियां के स्मारक बनाकर मेलों की शुरुआत की. ये मेलें आज भी जारी हैं.
राजा सुहेलदेव 11वीं सदी के एक नीम अफसानवी राजा थे और उन्हें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती क्षेत्र से जोड़ा जाता है. 17वीं सदी की फारसी किताब 'मीरात-ए-मसूदी' के मुताबिक, उन्होंने 1033-34 ईस्वी में बहराइच के चित्तौरा तालाब के पास गजनवी सेनापति सैयद सालार मसूद को जंग में हराया. इस जंग में सुहेलदेव ने स्थानीय राजपूत और अन्य क्षेत्रीय शासकों के साथ गठबंधन कर सैयद सालार मसूद गाजी की फौज से मुकाबला किया, जिसमें राजा सुहेलदेव को बड़ी जीत हासिल हुई, और गाजी मियां शहीद हो गए.
हालांकि, उस समय के कई इतिहासिक स्रोतों में इस घटना का साफ तौर जिक्र नहीं मिलता है, इसलिए इसे ज्यादातर इतिहासकर और एक्सपर्ट किंवदंती मानते हैं. अलग-अलग समुदाय जैसे राजभर और पासी समुदाय के लोग महाराजा सुहेलदेव को अपना हीरो मानते हैं. राजा सुहेलदेव के वालिद का नाम भर राजा बिहारी मल, मां का नाम जयलक्ष्मी और गुरु बालार्क ऋषि थे. मुख्य रूप से लोककथाओं, स्थानीय रिवाजों और कुछ खास समुदायों की किताबों या कहानियों पर आधारित है.
बालार्क ऋषि और उनकी आश्रम की कहानी आधुनिक हिंदूवादी और राजभर कथाओं में काफी मशहूर है, लेकिन पुरातात्विक या लिखित प्रमाणों से इसकी पुष्टि नहीं होती. ये कथाएं सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए मशहूर हैं. राजा सुहेलदेव को उनकी बहादुरी और बेजोड़ जंगी हिकमत अमल के लिए याद किया जाता है.