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Akola Riots SIT Team Update: सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने एसआईटी में मुस्लिम और हिंदू अफसरों को शामिल करने के आदेश पर रोक लगा दी है. इस बेंच की सदारत सीजेआई बी.आर. गवई कर रहे थे.
यह मामला मोहम्मद अफजल मोहम्मद शरीफ नामक एक किशोर से जुड़ा है, जिसने शिकायत की थी कि उसने मई 2023 में अकोला दंगों के दौरान चार लोगों को एक व्यक्ति पर हमला करते हुए देखा था. बताया गया कि हमलावरों में से एक व्यक्ति के राजनीतिक संबंध थे. अफजल के अनुसार, जब उसने इस हत्या की शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, तो पुलिस ने उसकी बात नहीं सुनी.
हमले में अफजल को सिर में चोटें आईं. बाद में उसने और उसके पिता ने पुलिस अधीक्षक (SP) अकोला से भी शिकायत की, लेकिन वहां से भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. हत्या के शिकार व्यक्ति की पहचान विलास महादेव राव गायकवाड़ के रूप में हुई थी, जो एक मुस्लिम व्यक्ति की ऑटोरिक्शा चला रहे थे. अफजल का कहना था कि हमलावरों ने गायकवाड़ को मुस्लिम समझकर मार दिया.
अब इस माले में कोर्ट ने सितंबर में एक आदेश पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि इस मामले में भेदभाव करते हुए जांच नहीं की गई और एक एसआईटी टीम बनाने के आदेश दिए थे, जिसमें मुस्लिम और हिंदू दोनों आधिकारी शामिल हों.
महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दायर की थी. मुख्य न्यायाधीश गवई ने महाराष्ट्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को बताया कि तीन जजों की पीठ ने सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति संजय कुमार की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि SIT में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के सीनियर पुलिस अधिकारी शामिल किए जाएं.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य सरकार सितंबर के फैसले के अन्य सभी हिस्सों से सहमत है, लेकिन इस विशेष हिस्से से असहमति रखती है. पिछले कुछ दिनों पहले राज्य सरकार के जरिए दायर समीक्षा याचिका पर न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा के बीच मतभेद सामने आए थे. न्यायमूर्ति कुमार ने पुराने आदेश को बरकरार रखा, जबकि न्यायमूर्ति शर्मा ने अपना मत बदल दिया था.
राज्य सरकार का तक था कि SIT में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के सीनियर पुलिस अधिकारियों को शामिल करने का निर्देश इंस्टीट्यूट की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है और इससे यह मैसेज जाता है कि सरकारी अधिकारी साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से काम कर सकते हैं.
सितंबर में दिए गए फैसले पर न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा था कि जब पुलिस बल के मेंबर वर्दी पहनते हैं, तो उन्हें अपने निजी पूर्वाग्रहों और झुकावों, चाहे वह धार्मिक हों, जातिगत हों या किसी अन्य प्रकार के हों, उन्हें छोड़ देना चाहिए. उन्हें अपने कर्तव्य और वर्दी के प्रति पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से काम करना चाहिए. दुर्भाग्य से, इस मामले में ऐसा नहीं हुआ.