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Bareilly News Today: उत्तर प्रदेश में दक्षिणपंथी विचारधारा वाले संगठनों के बाद अब पुलिस का भी कथित तौर पर मुसलमानों पर जुल्म बढ़ गया है. हालिया दिनों अल्पसंख्यकों के खिलाफ पुलिस के जरिये की गई कई ऐसी कार्रवाईंया हैं, जिस पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी तरह के कथित पुलिसिया जुल्म के मामले में मुस्लिम बुजुर्ग शख्स की गिरफ्तारी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त आदेश दिए.
यह पूरा मामला बरेली का है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के रहने वाले 65 साल के महमूद बेग की कथित अवैध हिरासत के मामले में सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने एडीजी, आईजी और एसएसपी को आदेश दिया है कि वे महमूद बेग को आने वाले 8 सितंबर को अदालत में पेश करें. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बरेली के एसएसपी अनुराग आर्य को निजी तौर पर हर हाल में पेश होने के निर्देश दिये हैं.
हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, महमूद बेग के परिजनों का आरोप है कि बीते 20 जुलाई को उन्हें पुलिसकर्मी जबरन घर से उठा ले गए थे और तभी से वे पुलिस की हिरासत में हैं. परिवार ने कोर्ट से महमूद बेग की सुरक्षा की गुहार लगाते हुए उनकी जान को खतरा बताया है.
बेग की बीवी परवीन अख्तर ने इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. वहीं बेटे मुदस्सिर का आरोप है कि 20 जुलाई की रात को उनके घर पर करीब 11 लोग तीन गाड़ियों में आए और बेग को जबरन उठा ले गए. जब उन्होंने विरोध किया तो एक शख्स ने खुद को पुलिसकर्मी बताते हुए उस पर बंदूक तान दी और धमकी दी. परिवार का कहना है कि इस पूरी घटना के सीसीटीवी फुटेज भी मौजूद हैं, जिनमें पुलिस की गाड़ियां दिखाई दे रही हैं.
महमूद बेग के बेटे मुदस्सिर के मुताबिक, इसके बाद कुछ पुलिसकर्मी घर भी आकर उनके वालिद (महमूद बेग) की डायबीटीज की दवा भी मांगी थी, क्योंकि उनकी तबीयत बिगड़ रही थी. मुदस्सिर का आरोप है कि जब वह उनके पीछे गया तो उसे पुलिस लाइंस के पास एक इमारत में ले जाया गया और वहां उसके पिता की रिहाई के लिए एक लाख रुपये की मांग की गई. बाद में पता चला कि ये लोग बरेली पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) से जुड़े हुए अधिकारी थे.
परिवार का कहना है कि उन्होंने कई बार वरिष्ठ अधिकारियों से मदद मांगी और IGRS पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. मजबूर होकर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. बेग की पत्नी की ओर से पैरवी कर रहे वकील एहतेशाम अफसर खान ने बताया कि अदालत में तर्क दिया गया कि बिना किसी गिरफ्तारी, FIR या वारंट के पुलिसकर्मियों के जरिये किसी को उठाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है.