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Ganga Iftar Party Case: धर्मनगरी के नाम से मशहूर वाराणसी में रमजान के पाक मौके पर गंगा नदी में इफ्तार करने को लेकर विवाद हो गया था. इस मामले में पुलिस ने 14 मुस्लिम नौजवानों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया था. अब घटना के कई महीनों बाद आरोपियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है.
बीते दिनों 8 लोगों को अदालत ने एफीडेविट देने के बाद जमानत दे दी थी. वहीं, अब इसी मामले में मुस्लिम नौजवानों के खिलाफ रंगदारी मांगने के आरोपों पर सवाल उठाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संदिग्ध माना है. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों ने अपने हलफनामों में अपने कृत्य को लेकर सच्चा पछतावा जताया है.
अदालत की इस टिप्पणी के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 15 मई को 14 आरोपियों में से आठ युवकों को जमानत दे दी. जिन लोगों को राहत मिली है, उनमें मोहम्मद आजाद अली, मोहम्मद तहसीम, निहाल अफरीदी, मोहम्मद तौसीफ, मोहम्मद अनस, मोहम्मद समीर, मोहम्मद अहमद रजा और मोहम्मद फैजान शामिल हैं.
इनमें से पांच आरोपियों को जस्टिस राजीव लोचन शुक्ल ने जमानत दी, जबकि तीन की जमानत याचिकाओं पर फैसला जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने सुनाया. जस्टिस शुक्ल ने अपने आदेश में कहा कि आरोपियों की तरफ से दाखिल हलफनामों से यह साफ दिखाई देता है कि उन्हें अपने कृत्य पर हकीकत में पछतावा है.
बता दें, यह पूरा मामला 17 मार्च का है, जब रमजान के दौरान 14 मुस्लिम नौजवानों वाराणसी में गंगा नदी पर नाव में बैठकर इफ्तार पार्टी की थी. उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बिरयानी खाई और बचा हुआ खाना नदी में फेंक दिया. इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया वायरल होने के बाद विवाद शुरू हो गया. इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सभी नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया.
वाराणसी पुलिस ने यह कार्रवाई भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत के बाद की थी. शिकायत में कहा गया था कि वायरल वीडियो में मुस्लिम नौजवान नाव पर रोजा खोलते और चिकन बिरयानी खाते दिखाई दे रहे हैं. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने गंगा नदी में बचा हुआ खाना फेंककर हिंदू धार्मिक भावनाओं को आहत किया है.
इसके बाद पुलिस ने आरोपी नौजवानों पर कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया. इनमें समाज में दुश्मनी फैलाने, सार्वजनिक उपद्रव, जल स्रोत को गंदा करने, पूजा स्थल को नापाक करने, धार्मिक भावनाएं भड़काने, रंगदारी मांगने और अन्य धाराएं शामिल की गईं. साथ ही जल प्रदूषण रोकथाम कानून के तहत भी कार्रवाई की गई.
हालांकि जमानत पर सुनवाई के दौरान अदालत ने रंगदारी मांगने के आरोपों को प्रथम दृष्टया संदिग्ध माना. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपियों और उनके परिवारों ने समाज को हुई पीड़ा पर अफसोस जताया है. अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी आपराधिक मामले में जमानत मांगते समय आरोपी से अपराध स्वीकार करने की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन अदालत के सामने दाखिल हलफनामों और बचाव पक्ष के वकीलों की दलीलों से यह जरूर लगता है कि आरोपियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर हकीकत में पछतावा जताया है.