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Allama Iqbal Birthday: आपने ये शेयर तो जरूर सुना होगा- ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है. ये शेर लाखों लोगों की जिंदगियों का सार बना. आज इसी शेर के रचयता का जन्मदिन है. आज दुनिया भर में अल्लामा मुहम्मद इक़बाल का जन्मदिन मनाया जा रहा है. वह शख़्सियत जिन्हें 'शायर-ए-मशरिक़' (पूर्व का कवि) कहा जाता है. इक़बाल न केवल एक महान शायर थे, बल्कि दार्शनिक, विचारक और राजनीतिक चेतना के प्रवक्ता भी थे. उनकी कविताओं और विचारों ने भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को अपनी पहचान और आत्मसम्मान की नई समझ दी.
अल्लामा मुहम्मद इक़बाल का जन्म 9 नवंबर 1877 को सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. उनके पिता शेख़ नूर मुहम्मद एक धार्मिक व्यक्ति थे. उनके पिता पैदाइशी मुसलमान नहीं थे. उनके पिता कश्मीरी ब्राह्मण थे, जो शोपियां के रहने वाले थे. उनके पिता का नाम रत्न लाल सपरु था. जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया. जिससे इकबाल के दादा खफा हो गए और उनसे सारे रिश्ते खत्म कर दिए.
बचपन से ही इक़बाल में इल्म और फिक्र के प्रति गहरी रुचि थी. उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम सियालकोट के स्कॉच मिशन कॉलेज से हासिल की. इसके बाद 1895 में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में दाख़िला लिया, जहां उन्होंने दर्शनशास्त्र और अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई की.
1905 में इक़बाल उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से फिलोस्फी में डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने जर्मनी की म्यूनिख यूनिवर्सिटी से पीएचडी की उपाधि हासिल की. उनका रिसर्च वर्क 'The Development of Metaphysics in Persia' था.
इक़बाल की शायरी सिर्फ़ सौंदर्यबोध या प्रेम तक सीमित नहीं रही. उन्होंने अपने कलाम में 'ख़ुदी' (आत्म-साक्षात्कार) का दर्शन प्रस्तुत किया. इक़बाल का मानना था कि इंसान के अंदर एक रचनात्मक ताकत है जो उसे ऊंचाइयों तक ले जा सकती है, अगर वह खुद को पहचाने.
इक़बाल ने भारत में मुसलमानों की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को गहराई से महसूस किया. उन्होंने 1930 के अपने प्रसिद्ध इलाहाबाद भाषण में "अलग मुस्लिम राज्य" की परिकल्पना रखी. यह विचार आगे चलकर पाकिस्तान आंदोलन की वैचारिक नींव बना. हालांकि, इक़बाल की सोच सिर्फ़ एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं थी. उनका मकसद पूरी उम्मत-ए-मुस्लिम (विश्व मुस्लिम समुदाय) में आत्मविश्वास और शिक्षा की जागृति लाना था.
अल्लामा इक़बाल का मौत 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में हुई. उन्हें लाहौर की बादशाही मस्जिद के पास दफनाया गया. पाकिस्तान में उन्हें राष्ट्रीय कवि का दर्जा प्राप्त है और हर साल 9 नवंबर को 'इक़बाल डे' के रूप में मनाया जाता है.