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Babri Masjid: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें एक युवा लॉ ग्रेजुएट के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग की गई थी. यह मामला उस फेसबुक पोस्ट से जुड़ा है जिसमें कहा गया था कि बाबरी मस्जिद दोबारा बनाई जाएगी. यह याचिका मोहम्मद फैयाज़ मंसूरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के नाम से दायर की गई थी.
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि उन्होंने संबंधित फेसबुक पोस्ट देखी है और उन्हें इस मामले में आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी की ओर से पेश की गई दलीलें ट्रायल कोर्ट अपने स्तर पर सुनवाई के दौरान विचार कर सकता है. इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली.
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर किया गया था, जिसमें अदालत ने 2020 में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में आरोपी को भेजे गए समन को रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया था.
एफआईआर में आरोपी पर फेसबुक पर बाबरी मस्जिद से जुड़ी आपत्तिजनक पोस्ट करने का आरोप लगाया गया था. बताया गया कि याचिकाकर्ता ने 5 अगस्त 2020 को फेसबुक पर लिखा था,"बाबरी मस्जिद भी एक दिन दोबारा बनाई जाएगी, जैसे तुर्की में सोफिया मस्जिद दोबारा बनाई गई थी."
विवादित पोस्ट करने वाले याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उन्होंने केवल अपनी राय व्यक्त की थी, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार में आती है. उनका कहना था कि पोस्ट में कोई भड़काऊ या अभद्र भाषा नहीं थी. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ अन्य लोगों द्वारा पोस्ट पर की गई टिप्पणियां उनसे गलत तरीके से जोड़ी गईं, और इन्हीं टिप्पणियों के आधार पर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया.
याचिकाकर्ता के अनुसार, जांच में यह भी सामने आया कि जिन अकाउंट्स से आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं, उनमें से एक फर्जी प्रोफाइल थी, जिसे किसी तीसरे व्यक्ति के जरिए चलाया जा रहा थाय इसके बावजूद, केवल उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई की गई.
उन्होंने यह भी बताया कि इसी पोस्ट के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत एक साल से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था, लेकिन 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी नजरबंदी को रद्द कर दिया था.
बाबरी मस्जिद को 1992 में अयोध्या में हिंदुत्व संगठनों की भीड़ ने ढहा दिया था. उनका दावा था कि यह मस्जिद उस स्थल पर बनाई गई थी, जहां भगवान राम का जन्मस्थान मौजूद था. यह घटना हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच लंबे समय तक चले विवाद का कारण बनी. 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि मस्जिद को गिराना गैरकानूनी था.