Badaun Masjid Seal: बदायूं के आलापुर थाना क्षेत्र के ककराला रोड पर उस समय हड़कंप मच गया, जब स्थानीय पुलिस और प्रशासन एक मस्जिद को सील करने पहुंच गया. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जिला प्रशासन ने मौके पर भारी संख्या पीएसी और पुलिस फोर्स तैनात किया है. मामले में आगे की कार्रवाई जारी है.
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Badaun News Today: उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक बार फिर प्रशासन ने नव निर्माणधीन मस्जिद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की. जिला प्रशासन ने बदायूं में एक निर्माणाधीन मस्जिद को सील कर दिया. बताया जा रहा है कि इस मस्जिद का निर्माण के लिए परमिशन नहीं ली गई थी. पुलिस और जिला प्रशासन की यह कार्रवाई इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है.
दरअसल, यह पूरा मामला बदायूं जिले के आलापुर थाना क्षेत्र के ककराला ईदगाह रोड का है. यहां पर एक निजी चिकित्सक के जरिये मस्जिद का निर्माण कराया जा रहा था. चिकित्सक के जरिये जिस जमीन पर जमीन पर मस्जिद बनवाई जा रही थी, वह विरातम में मिली थी. मस्जिद निर्माण की सूचना मिलते ही मौके पर स्थानीय पुलिस प्रशासन मौके पर पहुंचा गया और मस्जिद निर्माण के परमिशन दिखाने को कहा, लेकिन संबंधित लोग कोई वैध कागज नहीं दिखा पाए.
इसके बाद एसडीएम सदर और सीओ दातागंज ने मस्जिद को सील कर दिया. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए क्षेत्र में बड़ी संख्या में पीएसी और पुलिस फोर्स तैनात किया गया है. फिलहाल क्षेत्र में स्थिति शांतिपूर्ण बनी हुई है. पुलिस ने निजी चिकित्सक को हिरासत में लिया है और आगे की जांच कर रही है.
बदायूं जामा मस्जिद पर विवाद
इससे पहले भी बदायूं में मस्जिद को लेकर विवाद हो चुका है, जब बीते साल दिसंबर में बदायूं की जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि पहले यहां नीलकंठ महादेव मंदिर था. यह मामला वर्तमान में फास्ट ट्रैक कोर्ट में विचाराधीन है. यह मुकदमा 8 अगस्त 2022 से कोर्ट में लंबित है.
विवाद की जड़ 2022 में सामने आई, जब अखिल भारत हिंदू महासभा के प्रदेश संयोजक मुकेश पटेल ने दावा किया कि जामा मस्जिद की जगह पर पहले नीलकंठ महादेव मंदिर था. उन्होंने कोर्ट में याचिका दाखिल कर वहां पूजा-अर्चना की अनुमति मांगी. याचिका में यह भी कहा गया कि वहां अब भी मूर्तियां, प्राचीन खंभे, सुरंग और अन्य प्रमाण मौजूद हैं, जिससे मंदिर होने की पुष्टि होती है.
गौरतलब है कि बदायूं की जामा मस्जिद को देश की सातवीं सबसे बड़ी मस्जिद माना जाता है, जिसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक के शासनकाल में हुआ था. हिंदू महासभा का दावा है कि 1875 से 1978 के बीच के गजट दस्तावेजों में भी इसके मंदिर होने के प्रमाण दर्ज हैं और कुतुबुद्दीन ऐबक के समय पर यहां पर मंदिर था.