Muslim Woman Role in Indian Constitution Formation: 77वें गणतंत्र दिवस के जश्न की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. ऐसे में भारत के संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य बेग़म ऐज़ाज़ रसूल के योगदान का जिक्र करना जरुरी है. जिन्होंने मुसलमानों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट का विरोध किया, हिंदुस्तानी भाषा का समर्थन किया और समान नागरिक अधिकारों की मजबूत पैरवी कर भारतीय संविधान की लोकतांत्रिक नींव को मजबूती दी.
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Begum Aizaz Rasul Story: भारत में 77वें गणतंत्र दिवस की तैयारियां जोरों पर हैं. हर साल देश की राजधानी दिल्ली में राजपथ पर गणतंत्र दिवस पर भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है. इसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत देश के कई गणमान्य लोग हिस्सा लेते हैं. गणतंत्र दिवस हर साल 26 जनवरी को इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ था. भारतीय संविधान को लिखने में दो साल 11 महीने 18 दिन लगे थे.
अंग्रेजों के गुलामी के बेड़ियां तोड़ने के बाद जब भारत के लोग अपना भविष्य तय कर रहा थे, तब संविधान सभा में 299 सदस्य देश की बुनियाद लिख रहे थे. इन्हीं सदस्यों में एक नाम ऐसा था, जो महिला भी था, मुस्लिम भी और विचारों में पूरी तरह आधुनिक. यह नाम था बेग़म ऐज़ाज़ रसूल. बेग़म ऐज़ाज़ रसूल भारत की संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं.
पुरुष प्रधान समाज में बनाई अलग पहचान
उस दौर में जब महिलाओं की राजनीति में मौजूदगी बेहद सीमित थी. उनका संविधान सभा तक पहुचना अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी. 2 अप्रैल 1909 को जन्मीं बेग़म ऐज़ाज़ रसूल ने बहुत कम उम्र में सार्वजनिक राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. उनका पूरा नाम बेगम कुदसिया ऐजाज रसूल था. साल 1937 में वे संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) की विधानसभा के लिए चुनी गईं.
खास बात यह थी कि बेग़म ऐज़ाज़ रसूल गैर आरक्षित सीट से चुनाव जीतकर आईं, जो उस समय किसी महिला के लिए आसान नहीं था. वे आगे चलकर उत्तर प्रदेश विधानसभा की उपाध्यक्ष भी बनीं और आजादी के बाद विधानसभा में विपक्ष की नेता की भूमिका निभाई. उन्होंने ऐसे समय में लोगों की सेवा का फैसला किया, जब महिलाओं को चारदीवारी में कैद रखा जाता था और उन्होंने इस भ्रांति को तोड़ते हुए एक अलग पहचान बनाई.
हिंदी उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी भाषा का किया समर्थन
1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ, तब बेग़म ऐज़ाज़ रसूल मुस्लिम लीग की ओर से सदस्य बनीं. लेकिन उन्होंने अपनी पहचान किसी धार्मिक प्रतिनिधि के तौर पर नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक के तौर पर रखी. संविधान सभा में उन्होंने कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी. जैसे राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर उन्होंने हिंदी उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी भाषा का समर्थन किया. मौलिक अधिकारों को मजबूत और प्रभावी बनाने पर जोर दिया.
धर्म आधारित सेपरेट इलेक्टोरेट का किया विरोध
बेग़म ऐज़ाज़ रसूल का राजनीतिक दृष्टिकोण अपने समय से कहीं आगे था. उन्होंने न सिर्फ संपत्ति के अधिकार में उचित मुआवजे की जोरदार वकालत की, बल्कि संविधान निर्माण के दौरान बराबरी और इंसाफ की आवाज को मजबूती से उठाया. उनका मानना था कि आजादी का असली वजह तभी पूरी होगी, जब नागरिकों के अधिकार बिना किसी भेदभाव के सुरक्षित होंगे.
लेकिन इतिहास में उनका सबसे साहसिक और चर्चित रुख रहा धर्म के आधार पर अलग चुनावी व्यवस्था (सेपरेट इलेक्टोरेट) का खुला विरोध करना. उस दौर में, जब पहचान की राजनीति जोर पकड़ रही थी, बेग़म ऐज़ाज़ रसूल ने साफ शब्दों में चेताया कि धर्म के नाम पर राजनीति देश को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करेगी.
बेग़म ऐज़ाज़ रसूल का विश्वास था कि बराबरी का रास्ता अलगाव में नहीं, बल्कि समान नागरिक अधिकारों में है. उनके लिए भारत की मजबूती किसी एक पहचान में सिमटने से नहीं, बल्कि विविधता में एकता को अपनाने से संभव थी. यही सोच उन्हें भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक दूरदर्शी और निर्भीक आवाज़ बनाती है.
आजादी के बाद मुस्लिम लीग के भंग होने पर बेग़म ऐज़ाज़ रसूल कांग्रेस में शामिल हो गईं. वे राज्यसभा की सदस्य भी रहीं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहीं. राजनीति के साथ-साथ उन्होंने खेल जगत में भी योगदान दिया. वे कई सालों तक भारतीय महिला हॉकी महासंघ और बाद में एशियाई महिला हॉकी महासंघ की अध्यक्ष रहीं. उनके सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र निर्माण में योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण सम्मान से नवाज़ा.
बेग़म ऐज़ाज़ रसूल की विरासत आज भी है प्रासांगिक
बेग़म ऐज़ाज़ रसूल की सबसे बड़ी पहचान यही रही कि उन्होंने धर्म और लिंग से ऊपर उठकर संविधान में बराबरी की बात की. वे मानती थीं कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन लोकतंत्र की नींव समान अधिकारों पर ही टिक सकती है. आज जब संविधान और समान नागरिक अधिकारों पर बहस होती है, तो बेग़म ऐज़ाज़ रसूल की सोच पहले से ज्यादा प्रासंगिक नजर आती है.
एक ऐसी महिला, जिसने इतिहास के सबसे निर्णायक मोड़ पर बराबरी की आवाज बुलंद की. वह भी ऐसे समाज में जहां छूआ-छूत और धर्म के आधार पर जातीय भेदभाव आम बात थी. बेग़म ऐज़ाज़ रसूल के विचारों की झलक उनकी ऑटोबायोग्राफी 'From Purdah to Parliament' में दिखाई पड़ती है. भारत के निर्माण में उनके अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया.
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