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Bihar Assembly Election 2025: आजाद भारत के इतिहास में बिहार की सियासत हमेशा चर्चा के केंद्र में रही हैं. चुनाव आयोग ने सोमवार (6 अक्टूबर) को बिहार की 243 सीटों पर चुनाव का ऐलान कर दिया है, जिस पर पूरे देश की बीते कई महीनों से नजर थी. इसकी वजह है बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR). इसके खिलाफ पूरे राज्य में भारी विरोध देखने को मिला था.
सत्तारूढ़ BJP-RJD की मांग के मुताबिक ही सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दो चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया है. पहले फेज में 121 सीटों पर 6 नवंबर को वोट डाले जाएंगे, वहीं दूसरे मरहले में 122 सीटों के लिए 11 नवंबर को वोटिंग होगी. बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे 14 नवंबर को ऐलान किए जाएंगे.
मुस्लिम समुदाय हमेशा से बिहार की सियासत में सियासी पार्टियों के निशाने पर रहा है. यहां की 13 करोड़ जनसंख्या में 2.3 करोड़ आबादी यानी 17 फीसदी से ज्यादा आबादी मुसलमानों की है. लेकिन सत्ता और सरकारी नौकरियों में उनकी जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व नाम मात्र की है. इस बार आरजेडी, कांग्रेस, जेडीयू समेत दूसरे कथित सेक्यूलर दलों के कई नेताओं ने मुसलमानों को सत्ता में उचित भागीदारी दिलाने की मांग की है. फिलहाल बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से 19 सीटों पर मुस्लिम विधायक हैं.
साल 2006 में पेश हुई सच्चर कमेटी ने मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर चौंकाने वाला डेटा पेश किया था. इस कमेटी का गठन मनमोहन सरकार ने देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर के अध्ययन के लिए बनाया था. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में मुसलमानों की स्थिति दलितों और आदिवासियों से भी बदतर है, उनके पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह में से सियासत में भागीदारी की कमी भी है.
बिहार में मुसलमानों को लंबे समय से उचित सियासी हिस्सेदारी देने की मांग उठती रही है. बिहार के चुनावी साल में समझते हैं कि कैसे आजादी के बाद बिहार में मुस्लिमों को सियासत में हाशिये पर रखा गया है. बिहार में साल 1952 से 2015 तक हुए 15 विधानसभा चुनावों में कुल 4,593 सीधे निर्वाचित विधायक चुने गए, जिनमें से सिर्फ 334 मुसलमान विधायक शामिल थे यानी लगभग 70 सालों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व सिर्फ 7.27 फीसदी रहा.
अगर उनकी जनसंख्या के अनुपात में देखा जाए तो 633 मुसलमान विधायक होने चाहिए थे, लेकिन हकीकत में महज 334 विधायक ही चुने गए, जिससे मुसलमानों को 299 विधायकों की कमी का सामना करना पड़ा. यह 47.24 फीसदी को एक तरह से उपेक्षित रखा गया. जो यह दर्शाता है कि बिहार के मुसलमान समाज को लंबे समय से सियासी रूप से वंचित रखा गया है.
बिहार विधानसभा में मुसलमानों का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व 1985 में देखा गया, जब 34 मुसलमान विधायक चुने गए. इसके पहले या बाद में यह संख्या इस स्तर तक नहीं पहुंची. वहीं 2020 के विधानसभा चुनाव में उत्तर-पूर्वी सीमांचल क्षेत्र में AIMIM ने असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में जोरदार प्रदर्शन किया. इस क्षेत्र में AIMIM ने 5 सीटें जीतकर बिहार के सियासत में हलचल पैदा कर दी, जबकि पूरे राज्य में साल 2020 में महज 19 विधायक ही जीते थे. AIMIM की जीत ने कथित सेक्यूलर पार्टियों को एक आईना दिखाने का काम किया. जो लगातार मुस्लिम वोट बैंक की सियासत करते हैं.
2020 में कांग्रेस ने मुसलमान समाज के शैक्षिक वर्ग से संबंध रखने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी, जिनमें AMU और JNU जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े लोग शामिल थे. कांग्रेस ने कुल 12 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली. बावजूद इसके कांग्रेस के 3 मुस्लिम विधायक फिर से चुने गए.
RJD ने मुस्लिम यादव समीकरण को बनाए रखते हुए कुल 8 मुस्लिम विधायक चुने गये. यह संख्या 2015 में 12 थी. RJD ने कई ऐसे क्षेत्रों में जीत हासिल की, जहां पहले गैर-मुस्लिम विधायक रहे. पिछले चुनाव की बात करें तो AIMIM के पांच, बीएसपी का 1, कांग्रेस के 4, CPIML के 1, आरजेडी के 8 मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत हासिल की और बिहार की विधानसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई पड़े.
अन्य राज्यों जैसे असम, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के मुकाबले बिहार विधानसभा की खासियत यह रही कि मुसलमान सदस्यों की संख्या अपेक्षाकृत स्थिर रही. यह संख्या 1967 और 2005 में 17 और 1985 में अधिकतम 29 रही, जो 2000 में भी दोहराई गई. 1952 और 1957 के चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मुसलमानों पर लगभग एकाधिकार था, लेकिन 1962 के चुनावों ने मुसलमानों की राजनीतिक विविधता की शुरुआत की.
साल 1977 में जनता पार्टी ने कुल 24 मुस्लिम बाहुल्य सीटों में से 13 और INC ने 8 सीटें जीतीं. 1980-85 के दौरान INC ने बिहार में फिर से पकड़ बनाई, जैसे कि पूरे देश में हुआ. इसकी वजह से साल 1985 में बिहार के मुसलमानों ने 34 विधायक का उच्चतम प्रतिनिधित्व स्तर पहुंचादिया. 1990 के बाद से जनता दल (JD) के गठन मुसलमानों का अहम सियासी नुमाइंदा बन गया.
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