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Brigadier Mohammad Usman’s Martyrdom Day: जंग सिर्फ बारूद, गोलियों और तोपों से नहीं जीती जाती, बल्कि बुलंद हौसलों, मजबूत इरादों और मुल्क के लिए जान न्योछावर कर देने के जज्बे से भी फतह हासिल होती है. साल 1947-48 के भारत-पाकिस्तान जंग में एक ऐसा ही नाम पूरी शिद्दत से उभरकर सामने आया था, ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान. उन्हें आज भी "नौशेरा का शेर" कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपने जवानों का हौसला टूटने नहीं दिया.
नौशेरा का शेर, देश की आन-बान-शान के लिए 3 जुलाई 1948 को शहीद हो गया था. आज उनका 78वां शहादत दिवस है, और देशभर में उनकी कुर्बानी को याद किया जा रहा है. ब्रिगेडियर उस्मान की जिंदगी और उनकी फौजी खिदमत पर आधारित किताब "The Lion of Naushera: The Life and Times of Brigadier Mohammed Usman" में उनके बेदाग किरदार, शानदार कियादत और मुल्क के लिए बेमिसाल वफादारी का तफसील से जिक्र मिलता है. शहीद ब्रिगेडियर उस्मान की नजर में फौज की सबसे बड़ी ताकत हथियार नहीं, बल्कि जवानों की आपसी यकजहती और वतन के लिए उनका जज्बा था.
कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में जब दुश्मन लगातार हमले कर रहा था और हालात बेहद संगीन थे, तब ब्रिगेडियर उस्मान हर वक्त अपने जवानों के साथ मोर्चे पर मौजूद रहते थे. वे पीछे से हुक्म देने वाले अफसर नहीं, बल्कि सबसे आगे खड़े होकर अपने जवानों का हौसला अफजाई करने वाले कमांडर थे. यही वजह थी कि उनकी अगुवाई में जवान आखिरी दम तक डटे रहे. उन्होंने मकबूल नारा "जय हिंद" के जरिये भारतीय नौजवानों को एक सूत्र में पिरो दिया था.
"जय हिंद" का नारा उस दौर में जवानों के लिए महज अल्फाज नहीं था, बल्कि मुल्क के लिए कुर्बानी और यकजहती का एहसास बन चुका था. ब्रिगेडियर उस्मान भी इसी सोच के हामी थे कि फौज में किसी जवान की पहचान उसके मजहब, जात या इलाके से नहीं, बल्कि तिरंगे के लिए उसकी वफादारी से है. यही सोच उनकी पूरी फौजी जिंदगी में साफ दिखाई देती है.
"जय हिंद"...यह सिर्फ दो शब्द नहीं, बल्कि मुल्क से मोहब्बत, एकता और कुर्बानी का ऐसा पैगाम है, जो आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में जोश भर देता है. आज भारतीय फौज से लेकर सरकारी समारोहों और आम लोगों की जुबान तक गूंजने वाला यह नारा दरअसल आजादी की लड़ाई के दौरान जन्मा था. बहुत कम लोग जानते हैं कि "जय हिंद" की रिवायत की शुरुआत आजाद भारत में नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से हुई थी.
"जय हिंद" को सबसे पहले आजाद हिंद फौज में अभिवादन के तौर पर अपनाया गया. इस नारे को लोकप्रिय बनाने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके करीबी सहयोगी आबिद हसन सफरानी की अहम भूमिका मानी जाती है. आजाद हिंद फौज में जवान एक-दूसरे का इस्तकबाल "जय हिंद" कहकर करते थे. मकसद साफ था- फौज में मजहब, जात और इलाके की पहचान से ऊपर उठकर सिर्फ एक पहचान हो, और वह हो हिंदुस्तान.
साल 1947 में देश आजाद होने के बाद भी इस रिवायत को खत्म नहीं किया गया. इसके उलट, आजाद भारत की फौज ने इसे आजाद हिंद फौज की विरासत के तौर पर अपनाया. इसमें सबसे बड़ी भूमिका रही "नौशेरा के शेर की." धीरे-धीरे "जय हिंद" भारतीय सेना का एक जाना-पहचाना अभिवादन बन गया और बाद में यह पूरे देश में राष्ट्रीय सलाम की तरह मशहूर हो गया.
आजादी के बाद "जय हिंद" को भारतीय सेना में आगे बढ़ाने का श्रेय किसी एक शख्स को नहीं दिया जाता. यह एक ऐसी रिवायत थी, जिसे सेना ने सामूहिक रूप से अपनाया और आगे बढ़ाया. उस दौर में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सेना के आला अफसरों ने भी "जय हिंद" को राष्ट्रीय अभिवादन के तौर पर प्रोत्साहित किया.
हालांकि, जानकारों का कहना है कि इसी दौर में 1947-48 के भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान "नौशेरा का शेर" कहे जाने वाले ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान अपने जवानों के बीच "जय हिंद" का खूब इस्तेमाल करते थे. शहीद ब्रिगेडियर उस्मान की वजह से "जय हिंद" का नारा दोबारा इतना मकबूल हो गया है कि यह सेना में एक परंपरा बन गई. जानकार इसको एक नारा से परंपरा बनाने के लिए ब्रिगेडियर उस्मान की भूमिका को अहम मानते हैं.
उनकी अगुवाई में लड़ने वाले फौजियों के बीच यह नारा जोश, यकजहती और मुल्क के लिए कुर्बानी के जज्बे की निशानी बन गया. माना जाता है कि इसी वजह से फौज में इसकी मकबूलियत और भी बढ़ गई. आज "जय हिंद" सिर्फ सेना का अभिवादन नहीं, बल्कि पूरे देश की पहचान बन चुका है. स्कूलों से लेकर सरकारी समारोहों तक और सीमा पर तैनात जवानों से लेकर आम नागरिकों तक, यह नारा हर हिंदुस्तानी को एक ही पैग़ाम देता है-मजहब, इलाकाइयत और जाति-पिता सबसे ऊपर है हिंदुस्तान.