HC on Guru Ghasidas University Namaz Row: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से जबरन नमाज पढ़ाने के आरोप में फंसे प्रोफेसर दिलीप झा को राहत नहीं मिली. अदालत ने प्रोफेसर की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती है. हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब उन पर ट्रायल का मामला साफ हो गया है.
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Chhattisgarh News Today: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जबरन नमाज पढ़ाने के आरोपी प्रोफेसर की राहत याचिका खारिज कर दी है. आरोप है कि एक कॉलेज कैंप के दौरान छात्रों को कथित रूप से मजहबी सरगर्मियों के लिए मजबूर किया गया. अदालत ने साफ कर दिया कि इस स्तर पर एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को खत्म नहीं किया जा सकता और मामला अब ट्रायल के जरिए ही आगे बढ़ेगा.
यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित एक कार्यक्रम से जुड़ा है, जो मार्च में गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी के जरिये आयोजित राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के सात दिवसीय कैंप के दौरान सामने आया था. आरोप है कि ईद के मौके पर मुस्लिम छात्रों को स्टेज पर नमाज अदा करने को कहा गया, जबकि गैर-मुस्लिम छात्रों को नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया गया. आरोप है कि विरोध करने वाले छात्रों पर दबाव बनाया गया और उनका प्रमाण पत्र रद्द करने जैसी धमकी भी दी गई.
इस मामले में पुलिस ने शुरुआती जांच के बाद एफआईआर दर्ज की थी और बाद में विस्तृत जांच कर आरोप पत्र भी दाखिल किया. इस मामले में पुलिस ने दिलीप झा नाम के प्रोफेसर को नामजद आरोपी बताया. बताया जा रहा है कि उस समय वे प्रोग्राम के कोऑर्डिनेटर के रूप में काम कर रहे थे.
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दिलीप झा ने अदालत में दलील दी कि उनका इस पूरे घटनाक्रम से कोई सीधा संबंध नहीं था और वे उस समय मौके पर मौजूद भी नहीं थे. उन्होंने कहा कि उन्हें बिना आधार के इस मामले में फंसाया गया है और यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है. वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि यह मामला तथ्यों के विवाद से जुड़ा है, जिसका सही मूल्यांकन सिर्फ ट्रायल के दौरान ही मुमकिन है. सरकार ने प्रोफेसर दिलीप झा के जरिये दायर याचिका में एफआईआर रद्द करने की मांग का विरोध किया.
हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि आरोप पत्र में प्रथम दृष्टया ऐसे सबूत मौजूद हैं, जो मामले के ट्रायल को जरूरी बनाते हैं. अदालत ने यह भी साफ किया कि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि मामला बदनियती में दर्ज किया गया है, क्योंकि जांच पूरी हो चुकी है और सबूत भी इकट्ठे किए जा चुके हैं.
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में शुरुआती चरण पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अगर आरोपी की भूमिका या मौजूदगी को लेकर विवाद है, तो उसका परीक्षण ट्रायल के दौरान सबूत और जिरह के आधार पर ही होगा. अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी हवाला दिया, जिसके मुताबिक एफआईआर को सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही रद्द किया जा सकता है. चूंकि इस मामले में ऐसी कोई स्थिति नहीं पाई गई, इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया.
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