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Delhi Riots 2020 Update: दिल्ली में साल 2020 में हुए दंगों से जुड़े मामले की सुनवाई शुक्रवार (21 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट में हुई. इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कोर्ट के सामने दावा किया कि दिल्ली जड़े UAPA मामलों का ट्रायल अभी पूरा होने में करीब दो साल लग सकते हैं. इन मामलों में पुलिस ने उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा और मीरान हैदर समेत कई अन्य लोगों को आरोपी बनाया है.
दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2020 दंगों से जुड़े UAPA मामलों का ट्रायल अभी पूरा होने में करीब दो साल लग सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार (24 नवंबर) को लिस्टेड की है. उस दिन कोर्ट उन सात आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस की दलीलें सुनना जारी रखेगा, जिन्होंने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने कहा कि "आतंकवाद में शामिल बौद्धिक लोग जमीनी स्तर पर काम करने वालों से ज्यादा खतरनाक होते हैं." यह टिप्पणी पुलिस ने उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य कार्यकर्ताओं की जमानत का विरोध करते हुए की. दिल्ली पुलिस ने हाल ही में हुए लाल किले ब्लास्ट का भी जिक्र किया और कहा कि शिक्षित लोग, जिनमें डॉक्टर और इंजीनियर भी शामिल हैं, देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल पाए जा रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने पक्ष रखा. एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने दावा किया कि "लाल किले में हुए बम धमाके में 15 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हो गए. यह हमला डॉक्टरों के जरिये किया गया कथित आतंकी हमले का एक उदाहरण है." जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आज दिल्ली पुलिस की दलीलें सुनने के बाद मामले को अगले दिन की दोपहर तक के लिए स्थगित कर दिया.
शरजील इमाम की ओर से सीनियर वकील सिद्धार्थ दवे पेश हुए. सिद्धार्थ दवे ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि दिल्ली पुलिस जिन वीडियो को सबूत के रूप में पेश कर रही है, वे सिर्फ लंबे तीन घंटे के भाषणों के छोटे-छोटे क्लिप हैं, जिनका उद्देश्य आरोपियों के खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा करना है. दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में यह भी दावा किया कि नागरिकता संशोधान कानून (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की योजना सिर्फ एक बहाना था. पुलिस के मुताबिक, इसका असली मकसद सत्ता परिवर्तन और देश की आर्थिक नाकाबंदी करनी थी.
पुलिस ने कहा कि इस साजिश में शामिल लोग आपस में कई व्हाट्सऐप ग्रुप्स के जरिए तालमेल बैठाते थे, जिनमें DPSG (जिसे चक्का जाम और धरनों की योजना बनाने के लिए इस्तेमाल करने के लिए बताया गया), MSJ (मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ JNU) और JCC (जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी) शामिल था.
पुलिस का यह भी आरोप है कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने MSJ और SOJ जैसे कथित सांप्रदायिक छात्र समूह बनाकर या उनका इस्तेमाल करके JNU और JMI के छात्रों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पुलिस का कहना है कि उन्हें अपनी इन गतिविधियों की वजह से कैंपस का धर्मनिरपेक्ष ढांचा तोड़ने में मदद मिली. यह प्रक्रिया दंगों से पहले हुए प्रदर्शन को हिस्सा थी.