Delhi Riots 2020: साल 2020 में दिल्ली में दंगे भड़क गए. हिंसा में कई लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए. इस घटना के सिलसिले में हजारों लोगों पर आरोप लगाए गए. हालांकि, पुलिस और अदालतें उनमें से कई लोगों के खिलाफ आरोपों को साबित करने में नाकाम रही हैं.
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Delhi Riots 2020: देश की राजधानी दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक अहम मामले में एक कोर्ट ने दो मोहम्मद फारूक और शादाब को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. उन पर कानून की गंभीर धाराओं के तहत इल्जाम लगाए गए थे, जिनमें आगजनी, दंगा और लूटपाट शामिल थे. हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पुलिस आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही और पेश किए गए गवाह भरोसेमंद नहीं थे.
दरअसल, मोहम्मद फारूक और शादाब नौकरी करते हैं. पिछले पांस साल से ट्रायल का सामना कर रहे थे. इस दौरान पुलिस ने कई गवाह पेश किए, लेकिन कोर्ट में क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान उनके बयानों में गंभीर विरोधाभास सामने आए.
कोर्ट ने लगाई फटकार
कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि "गवाहों की विश्वसनीयता संदिग्ध है और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा है." कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस यह साबित करने के लिए कोई सीधा या तकनीकी सबूत पेश करने में नाकाम रही कि दोनों आदमी घटनास्थल पर मौजूद थे या किसी हिंसा में शामिल थे. इसलिए, कानूनी मानकों के मुताबिक, उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता था.
फारूक और शादाब के वकील ने जताई खुशी
वहीं, फारूक और शादाब के वकील सलीम मलिक ने कहा कि यह फैसला न्याय और संविधान की जीत है. उन्होंने कहा कि पांच साल तक ट्रायल का दबाव झेलने के बाद दोनों को आखिरकार न्याय मिला है. उन्होंने आगे कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोप पुराने थे और उनका कोई ठोस आधार नहीं था. पुलिस के गवाह क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान टूट गए. हर बयान दूसरे से विरोधाभासी था. ऐसे मामले न्यायपालिका पर बोझ डालते हैं और निर्दोष लोगों के जीवन को भी प्रभावित करते हैं."
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की भूमिका
आरोपियों में से एक शादाब का मामला शुरू में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने संभाला था, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी भागीदारी बंद कर दी. इसके बावजूद कोर्ट ने उपलब्ध सबूतों के आधार पर शादाब और फारूक दोनों को पूरी तरह से निर्दोष घोषित कर दिया. इस फैसले के बाद दोनों परिवारों ने राहत की सांस ली है.