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Jammu Kashmir News Today: जम्मू कश्मीर लंबे समय से आतंक के दंश झेल रहा है. बीते कुछ सालों आतंकी घटनाओं में कमी आई है, लेकिन 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पर्यटकों पर सरहद पार से आने वाले आतंकियों ने हमला कर दिया. इस हमले 26 गुनाह लोग मारे गए, जिसने पूरे देश के झकझोर कर रख दिया. दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर कई ऐसे परिवार हैं, जो सालों आतंक के साये में जी रहे हैं और अपने साथ हुए जुल्म के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं.
वहीं, अब जम्मू-कश्मीर के उन हजारों परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण जागी है, जो बीते तीन दशकों से आतंकवाद की वजह से अपनी जिंदगी में अंधेरे झेल रहे थे. प्रदेश सरकार की अगुवाई में शुरू की गई पुनर्वास योजना के तहत आतंकवाद पीड़ित परिवारों को न्याय, नौकरी और आर्थिक मदद मिल रही है, जिससे उनकी जिंदगी अब एक नई दिशा में बढ़ रही है.
उत्तर कश्मीर के रफियाबाद की रहने वाली फहमीदा बेगम और उनकी बेटी दरख्शां का संघर्ष उन हजारों पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करता है, जो आतंकवाद की वजह से बेसहारा हो गए. साल 2016 में फहमीदा के पति फैयाज अहमद की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी. फैयाज पर भारतीय एजेंट होने का आरोप लगाकर उन्हें घर से बाहर निकालकर गोलियों से भून दिया गया था.
इसके बाद 9 साल तक रिश्तेदारों पर निर्भर रहकर जिंदगी बिताने वाली फहमीदा को आखिरकार इंसाफ मिला, जब उन्हें और उनकी बेटी को बारामुल्ला यूनिवर्सिटी हॉल में सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र सौंपा गया. इस मौके पर फहमीदा की आंखें भर आईं और उन्होंने कहा, "मैं एलजी साहब की शुक्रगुजार हूं. ये 9 साल बहुत मुश्किल थे, लेकिन आज लग रहा है कि हमारी जिंदगी में उजाला लौट आया है."
दरख्शां ने बताया, "मेरी मां ने हमारे लिए पिता की जिम्मेदारी भी निभाई और हमें पढ़ाया-लिखाया. आज हमें जो मिला है, वो उनकी मेहनत और सरकार की सहानुभूति का नतीजा है. ये बहुत पहले होना चाहिए था."
कुपवाड़ा के आदिल अहमद शेख की कहानी भी दिल दहला देने वाली है. उन्होंने बताया कि साल 2004 में जब वे छोटे थे, कुछ आतंकवादी उनके घर में घुसे और उनकी गर्भवती मां सहित चार परिजनों की हत्या कर दी. उन पर सुरक्षा बलों की मदद करने का आरोप लगाया गया था. तब से आदिल के पास न कोई सहारा था और न ही कोई इनकम का जरिया, जिससे वह अपना और अपने घर वालों का पेट पाल सकें. आदिल ने कहा, "आज पहली बार मुझे लग रहा है कि कोई हमारी भी सुन रहा है. मैं एलजी साहब का दिल से शुक्रगुजार हूं जिन्होंने हमारे दर्द को समझा और कार्रवाई की."
सैयद फारूक अहमद की पीड़ा उससे भी पुरानी है. 1992 में जब वे सिर्फ 6 महीने के थे, उनके पिता को आतंकवादियों ने घर से उठा लिया. तीन दिन तक टॉर्चर किया और फिर हंदवाड़ा चौक पर शव फेंक दिया. उनकी मां ने इंसाफ की लड़ाई लड़ी लेकिन बाद में उनकी भी मौत हो गई. फारूक ने बताया कि कैसे सालों तक उनकी फाइलें सिर्फ प्रोसेस में बताई जाती रहीं, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई. उन्होंने कहा, "जब एलजी साहब ने पीड़ितों से मिलने के बाद इस योजना का ऐलान किया तो हमें ऐसा लगा जैसे हमारे लिए ईद आ गई हो."
40 पीड़ितों को मिला नौकरी का तोहफा
बारामुल्ला के सरकारी डिग्री कॉलेज में आयोजित एक समारोह में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 40 आतंकवाद पीड़ितों को नियुक्ति पत्र सौंपे. यह योजना SRO-43 नीति के तहत चल रही है, जिसका मकसद आतंकवाद से प्रभावित परिवारों को सरकारी नौकरी और आर्थिक मदद देना है. एलजी सिन्हा ने कहा, "जब मैंने छह महीने पहले आतंकवाद पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, तो उनकी हालत देखकर मेरा दिल दहल गया. तब मैंने अफसरों से कहा कि वास्तविक पीड़ितों की पहचान की जाए और उन्हें उनका हक दिया जाए. आज यह प्रक्रिया शुरू हो गई है और यह आगे भी जारी रहेगी."
एलजी ने खुलासा किया कि 1990 के दशक में हुए खूनी संघर्ष में कई परिवारों की न तो एफआईआर दर्ज की गई और न ही उन्हें मुआवजा मिला. उन्होंने कहा कि हमें सिर्फ आश्वासन दिया गया कि और कहा गया कि अब हम उन मामलों की समीक्षा कर रहे हैं, जहां संपत्ति जब्त की गई थी. जहां भी संभव हो जब्त की गई जमीनें और संपत्तियां वापस की जाएंगी.
अब तक जम्मू-कश्मीर में 20 हजार आतंकवाद पीड़ितों की पहचान की जा चुकी है. इनमें से कुछ को सरकारी नौकरी मिलेगी और कुछ को व्यवसाय शुरू करने के लिए आर्थिक मदद दी जाएगी. यह योजना पिछली सरकारों की उन कमियों को भी दूर करेगी, जिनमें अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाया गया था. एलजी सिन्हा ने कहा, "हमने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं. मैं सभी पीड़ित परिवारों से अपील करता हूं कि वे अपना रजिस्ट्रेशन कराएं, जिससे उन्हें इंसाफ और मदद मिल सके. यह प्रक्रिया अब पूरे जम्मू-कश्मीर में चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएगी.