Land Purchase and Sale Law in Assam: असम सरकार ने नया SOP लागू कर हिंदू-मुस्लिम के बीच सीधे जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी है. अब संपत्ति सौदों के लिए DC की इजाजत जरूरी होगी. एक्सपर्ट का कहना है कि गुजरात की तरह यह कानून मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुंचाएगा और गेट्टोकरण को बढ़ावा देगा.
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Assam News Today: असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाली हिमंता बिस्वा सरमा सरकार लगातार कथित तौर एक समुदाय विशेष को टार्गेट कर की गई कार्रवाई की वजह से सुर्खियों में हैं. हालिया दिनों बीजेपी सरकार ने असम के मुस्लिम बहुल्य इलाकों में बड़े स्तर पर मुस्लिम इलाकों में बुलडोजर की कार्रवाई की, जिसकी न सिर्फ असम में बल्कि देश दुनिया में खूब आलोचना हुई है.
वहीं, अब असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक और बड़ा ऐलान किया है, जिसके बाद देश के सबसे बड़े बहुसंख्यक आबादी के सामने नई मुसीबत खड़ी हो गई है. दरअसल, हिमंता सरकार की कैबिनेट के जरिये बैठक कर फैसला लिया गया है, अब राज्य में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक-दूसरे से जमीन या दूसरी संपत्ति का सीधे तौर पर खरीद-फरोख्त नहीं कर पाएंगा.
हिमंता सरकार ने इसके लिए आज बुधवार (27 अगस्त) से स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रॉसीजर (SOP) लागू कर दी है. इस फैसले के बाद अब अगर कोई शख्स दूसरे धर्म के शख्स को जमीन खरीदना या बेचना चाहता है, तो उसे पहले जिला प्रशासन के डिप्टी कमिश्नर (DC) से इजाजत लेनी होगी. उसके बाद डीसी ही आखिरी फैसला लेगा कि आप उस संपत्ति को खरीद या बेच सकते हैं. सरकार का कहना है कि यह कदम जमीन से जुड़े विवादों और तनाव को रोकने के लिए उठाया गया है.
असम में जमीन की खरीद फरोख्त लागू होने के बाद आशंका जताई जा रही है कि गुजरात की तरह अब यहां पर संपत्ति खरीदने के बाद उस पर कब्जे के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ेगी. असम से यह कानून गुजरात में भी लागू है. गुजरात में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां सारी वैद्य प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद अधिकारियों के जरिये रोक लगा दी जाती है. हालांकि, बाद में मुस्लिम परिवारों ने गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से जीत भी हासिल की, इसके बावजूद उनको अभी तक संपत्तियों पर कब्जा नहीं मिला है.
गुजरात में 1986 से लागू डिस्टर्ब्ड एरियाज एक्ट साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के मद्देनजर बनाया गया था. इस कानून के तहत राज्य सरकार या कलेक्टर किसी इलाके को डिस्टर्ब्ड एरिया घोषित कर सकता है, ऐसे इलाकों में संपत्ति की खरीद-फरोख्त बिना कलेक्टर की इजाजत नहीं हो सकती है. साल 2019 में संशोधन के बाद नियम और सख्त किए गए, जिसके तहत खरीदार और बेचने वाले दोनों को यह साबित करना पड़ता है कि सौदा दबाव या धोखे से नहीं हो रहा.
हालांकि मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय को हिंदू बहुल इलाकों में घर या संपत्ति खरीदने से रोकता है और गेट्टोकरण को बढ़ावा देता है. कई मामलों के देखकर लगता है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों के यह आरोप काफी हद तक सही भी हैं. इसके उलट दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकार का कहना है कि यह कदम सांप्रदायिक तनाव रोकने के लिए है.
हाल ही में सूरत के रांदेर इलाके में एक मुस्लिम महिला शहनाज बेगम सैयद की खरीदी गई संपत्ति को इजाजत न होने की वजह से सील कर दिया गया. इस घटना से खरीदार को आर्थिक नुकसान हुआ और लंबे समय तक कानूनी पचड़े झेलने पड़े. इसी तरह 2023 में वडोदरा में एक हिंदू महिला के जरिये मुस्लिम खरीदार को संपत्ति बेचने का मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया, क्योंकि हिंदूवादी संगठनों ने धार्मिक आधार पर आपत्ति दर्ज कराई थी. हालांकि, बाद में कोर्ट ने लेन-देन की मंजूरी दे दी, लेकिन खरीदार को महीनों कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और काफी वक्त और पैसा दोनों खर्चा हुआ.
अहमदाबाद में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है. यहां मुस्लिम परिवार अक्सर जूहापुरा जैसे मुस्लिम-बहुल इलाकों में ही सिमटकर रह गए हैं. वजह यह है कि हिंदू-बहुल इलाकों में संपत्ति खरीदने के लिए इजाजत मिलना बेहद मुश्किल हो गया है. भरूच में भी 2022 में एक मुस्लिम परिवार को पुलिस रिपोर्ट और हिंदूवादी संगठनों के विरोध के बाद फ्लैट खरीदने की इजाजत नहीं दी गई.
एक्सपर्ट का कहना है कि यह कानून सामाजिक अलगाव और 'गेटोकरण' को बढ़ावा दे रहा है. मुस्लिम समुदाय को न सिर्फ आवासीय विकल्प सीमित मिल रहे हैं, बल्कि उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से भी नुकसान उठाना पड़ रहा है. कई मामलों में कानूनी लड़ाइयां लंबी और महंगी साबित होती हैं, जिससे लोगों में असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है.
गेट्टोकरण (Ghettoization) एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें किसी विशेष समुदाय, जाति, धर्म या वर्ग के लोगों को एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र या मोहल्ले तक सीमित कर दिया जाता है. अक्सर उनकी सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक पहचान की वजह से. यह प्रक्रिया स्वैच्छिक भी हो सकती है और कई बार परिस्थितियों या भेदभाव की वजह से थोप दी जाती है.
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