Hindu Groups Petition Ajmer Sharif Dargah: अजमेर शरीफ दरगाह को गैर-मजहबी मकाम बताने की याचिका पर अदालत ने महाराणा प्रताप सेना की दूसरी अर्जी मंजूर की है. इस मामले में 19 जनवरी 2026 को सुनवाई होगी. इससे पहले भी हिंदू सेना ऐसी ही अर्जी दे चुकी है. दोनों संगठन सर्वे और शिव मंदिर होने का दावा कर रहे हैं.
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Ajmer Sharif Dargah: सूफी रिवायत, अमन और मोहब्बत की पहचान अजमेर शरीफ दरगाह एक बार फिर सियासी और हिंदूवादी संगठनों की दावेदारी का मैदान बन गई है. जहां एक तरफ दरगाह सदियों से भाईचारे और इंसानियत का पैगाम देती आई है, वहीं कुछ हिंदूवादी संगठन इसे विवाद में घसीटने की कोशिशों में जुटे नजर आ रहे हैं. हिंदू संगठन महाराणा प्रताप सेना ने कोर्ट में याचिका दायर की है.
अजमेर शरीफ दरगाह को गैर-मजहबी मकाम बताने के दावे पर अजमेर की अदालत ने दूसरी दरख्वास्त भी मंजूर कर ली है. हिंदूवादी संगठन महाराणा प्रताप सेना की इस अर्जी पर अब 19 जनवरी को अदालत में सुनवाई होगी. इस मामले में अजमेर दरगाह कमेटी, केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को नोटिस जारी किए जाने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है.
हिंदू सेना भी कर चुकी है अर्जी दायर
गौरतलब हो कि इससे पहले भी हिंदू सेना की तरफ से अजमेर दरगाह को गैर-मजहबी मकाम बताने का दावा किया जा चुका है. उस मामले की सुनवाई अजमेर की अदालत में जज मनमोहन चंदेल कर रहे हैं. अब महाराणा प्रताप सेना की दूसरी अर्जी भी उसी तरह के दावे को लेकर दाखिल की गई है. इन दोनों हिंदू संगठनों ने दरगाह में सर्वे कराने की मांग की है और शिव मंदिर होने का दावा किया है.
हिंदू सेना और महाराणा प्रताप सेना नाम के दोनों संगठनों का कहना है कि दरगाह की जगह पर पहले शिव मंदिर था और इसी आधार पर वे सर्वे की मांग कर रहे हैं. गौरतलब है कि दरगाह को गैर-मजहबी मकाम बताने के कथित सबूत इससे पहले साल 2022 में भी मीडिया के सामने पेश किए गए थे, लेकिन मीडिया की जांच-पड़ताल में वे सबूत झूठे और गलत पाए गए थे. अब एक बार फिर हिंदूवादी संगठनों ने मशहूर सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (रह.) की पवित्र और ऐतिहासिक दरगाह को लेकर वावेला खड़ा कर दिया.
महाराणा प्रताप सेना के अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार के मुताबिक, उनकी तंजीम अपनी आस्था के हवाले से मजबूत दस्तावेजों के साथ अदालत पहुंची है. उनका कहना है कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर 19 जनवरी 2026 को अदालत में सुनवाई होगी. इस मामले में अब अदालत की अगली तारीख 19 जनवरी तय की गई है, जहां इन दावों और दस्तावेजों पर सुनवाई की जाएगी.
क्या है अजमेर दरगाह का इतिहास?
अजमेर शरीफ दरगाह, जिसे दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज या हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भी कहा जाता है, राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित एक बहुत ही पवित्र सूफी तीर्थस्थल है. यह दरगाह सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार है. उन्हें 'गरीब नवाज' कहा जाता है, जिसका मतलब है गरीबों का सहारा देने वाला. यह दरगाह भारत की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सूफी दरगाहों में से एक मानी जाती है. यहां हर धर्म, जाति और संप्रदाय के लोग आते हैं. इस दरगाह से प्रेम, करुणा, एकता और शांति का संदेश फैलता है.
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म साल 1141 ईस्वी में फारस यानी आज के ईरान में हुआ था. वे चिश्ती सिलसिले के बड़े सूफी संत थे. साल 1192 ईस्वी में वे भारत आए और अजमेर में बस गए. उन्होंने गरीबों की मदद, इबादत और इंसानियत की सेवा पर जोर दिया. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का इंतकाल साल 1236 ईस्वी में हुआ. इसके बाद उनकी मजार पर दरगाह बनाई गई.
दरगाह का शुरुआती निर्माण सुल्तान इल्तुतमिश के समय शुरू हुआ था. बाद में मुगल सम्राट हुमायूं ने इसे और भव्य, दिव्य और नव्य रूप दिया. इसके बाद मुगल बादशाह अकबर ने इस दरगाह को बहुत संरक्षण दिया. अकबर कई बार पैदल चलकर अजमेर शरीफ दर्शन के लिए आया था. शाहजहां के समय में भी दरगाह का विस्तार हुआ और उन्होंने यहां मस्जिदें बनवाईं. दरगाह का मशहूर निजाम गेट हैदराबाद के निजाम ने बनवाया था.
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