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Ajmer Sharif Dargah News: राजस्थान के अजमेर शरीफ दरगाह पर हर साल बड़ी संख्या में अकीदतमंद अपनी मुरादें लेकर पहुंचते हैं. अकीदतमंदों मुस्लिम समुदाय के अलावा हिंदू, सिख, क्रिश्चियन समेत अलग-अलग मजहब के लोगों के साथ दुनिया के कोने-कोने से लोग जियारत के लिए पहुंचते हैं. ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को भारत और दुनिया में मजहबी एकता और गंगा जमुनी तहजीब का गहवारा कहा जाता है.
हालांकि, अब कट्टरपंथी हिंदूवादी संगठनों को इससे भी परेशानी होने लगी है और उन्होंने देश में सांप्रदायिक सौहार्द के केंद्र को भी मजहब में बांटने की कवायद शुरू कर दी है. बताया जा रहा है कि हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने प्रधानमंत्री की ओर से चादर पेश करने की सालों पुरानी रिवायत पर रोक लगाने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है. इस मामले को लेकर अजमेर जिला कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की गई है, जिस पर सुनवाई भी शुरू हो गई है.
कोर्ट में हिंदू सेना ने दायर की अर्जी
हिंदू सेना प्रमुख विष्णु गुप्ता की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि प्रधानमंत्री या अन्य राष्ट्रीय नेताओं की जानिब से दरगाह में चादर पेश करना मुनासिब नहीं है. इसी आधार पर उन्होंने न सिर्फ प्रधानमंत्री की तरफ से बल्कि दूसरे सिसायी दलों और नेताओं के जरिये चादर पेश करने की रिवायत पर भी सवाल उठाए हैं. अदालत में दाखिल इस अर्जी में मांग की गई है कि सरकारी स्तर पर किसी भी नेता या अधिकारी के जरिये से दरगाह में चादर पेश करने की प्रथा पर रोक लगाई जाए. कोर्ट में इस पर कानूनी बहस जारी रहेगी और आगे की सुनवाई में फैसला सामने आने की उम्मीद है.
आजादी के बाद से जारी है चादर पोशी की रिवायत
बता दें, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर भारतीय प्रधानमंत्रियों की ओर से चादर चढ़ाने की रिवायत नई नहीं बल्कि आजादी के बाद से राष्ट्रीय एकता का प्रतीक मानी जाती रही है. इस रिवायत की शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1947 के बाद की थी. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू ने 1949 में अजमेर शरीफ का दौरा किया था और चादर चढ़ाई थी.
पीएम मोदी ने रिकॉर्ड 11 बार चादरपोशी
धार्मिक सद्भाव, सूफी परंपरा और राष्ट्र की साझा गंगा जमुनी तहजीब को सम्मान देने के मकसद से यह रिवायत शुरू की गई. तब से लेकर आज तक हर प्रधानमंत्री इस रिवायत को आगे बढ़ाते आये हैं, चाहे इंदिरा गांधी हों, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह या फिर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. दरगाह में चादर पेश करना रजब माह के उर्स के दौरान किया जाता है, जिसमें प्रधानमंत्री पहुंचें या प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से विशेष दूत चादर पेश करते हैं. नरेंद्र मोदी ने साल 2014 से अब तक 11 बार चादर भेजकर इस रिवायत को जारी रखा है.
हालांकि, हाल ही में कोर्ट में दाखिल एक अर्जी के बाद यह रिवायत सुर्खियों में है. याचिका में मांग की गई है कि प्रधानमंत्री व अन्य सियासी दिग्गजों के जरिये चादर पेश करने की सरकारी रिवायत पर रोक लगाई जाए. ऐसे में 75 सालों से चली आ रही यह रिवायत अब एक व्यापक बहस का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है. क्या यह धार्मिक सद्भाव का प्रतीक है या सियासी दखल की मिसाल? या फिर एक और समृद्ध, साझी विरासत को हिंदूवादी संगठनों की नजर लग जाएगी.