Workplace Prayer Rules in India: दफ्तर में नमाज या पूजा की इजाजत अक्सर बहस का विषय रही है. एक तरफ भारतीय संविधान ने देश के सभी नागरिकों को मजहबी आजादी दी है, तो वहीं इस मुद्दे पर अदालतों ने संतुलित रुख अपनाया है. संविधान मजहबी आजादी देता है, लेकिन कार्यस्थल पर अनुशासन और संस्थान के नियम प्राथमिक माने जाते हैं. कोर्ट ने साफ किया कि अकीदत का सम्मान जरूरी है, पर काम प्रभावित होने पर कार्रवाई वैध हो सकती है.
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Office Namaz Legal Status in India: दफ्तर की भागदौड़, तय समय-सीमा में टार्गेट पूरा करना और काम का दबाव. इसी माहौल के बीच एक सवाल अक्सर बहस का विषय बन जाता है, क्या कर्मचारी ऑफिस में पूजा कर सकता है या नमाज पढ़ सकता है? यह सिर्फ मजहबी आजादी का मामला नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन का मुद्दा है. अदालतों ने ऐसे मामलों में भावनाओं के बजाय कानून और संविधान की कसौटी पर फैसले दिए हैं. जो पूरी दुनिया में इंसाफ की एक नजीर है.
भारतीय संविधान का आर्टिकल 25 नागरिकों को अपने मजहब को खुलकर पालन करने की आजादी देता है. हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है. सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संस्थागत अनुशासन के तहत इस आजादी पर उचित सीमाएं लागू हो सकती हैं. अदालतों ने कई मामलों में साफ किया है कि कार्यालय पूजा स्थल नहीं होता और वहां संस्थान के नियम प्राथमिक होते हैं. इस बात को प्राइवेट कंपनियों में नौकरी करने वाले पेशेवर और सरकारी करने वाले लोगों के नजरिये से समझते हैं.
प्राइवेट कंपनियों में कॉन्ट्रैक्ट और नियमों की अहमियत
निजी कंपनियों में नौकरी नियुक्ति पत्र और कंपनी की नीति के मुताबिक चलती है. काम के घंटे, ब्रेक और आचरण से जुड़े नियम पहले से तय होते हैं. ऐसे मामलों में अदालतें यह देखती हैं कि मजहबी सरगर्मियों से काम प्रभावित हो रहा है या नहीं. केरल हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि मजहबी अकीदत का सम्मान जरूरी है, लेकिन कार्य समय में नियमों की अनदेखी को मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता. अगर कोई कर्मचारी चेतावनी के बावजूद नियम तोड़ता है, तो कंपनी की अनुशासनात्मक कार्रवाई को धार्मिक भेदभाव नहीं माना जाएगा.
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सरकारी दफ्तरों में सेवा नियम सर्वोपरि
सरकारी कार्यालयों में अदालतें अपेक्षाकृत सख्त रुख अपनाती हैं क्योंकि यहां काम सीधे जनता से जुड़ा होता है. मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी कार्यालयों को मजहबी सरगर्मियों का सेंटर नहीं बनाया जा सकता. हालांकि, शांत तरीके से और निर्धारित ब्रेक के दौरान इबादत करने या पूरा करने पर अलग दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन काम रोककर मजहबी सरगर्मियों को करना सेवा नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है.
इसमें एक तरह से सरकारी कर्मचारियों को मजहबी इजाजत की छूट मिल सकती है, वह भी तब जब कोई अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को लेकर सर्कुलर जारी करे. यह सर्कुलर कानून नहीं होता है बल्कि, एक निश्चित समयावधि तक के लिए आदेश होता है. इसको दूसरा संबंधित अधिकारी पलट सकता है. उदाहरण के लिए लक्षद्वीप में पहले शुक्रवार को वीक ऑफ दिया जाता था, लेकिन सरकार ने वीक ऑफ के बेहतर संयोजन के लिए दिसंबस 2021 में नया शेड्यूल जारी किया और शुक्रवार के वीक ऑफ को खत्म कर इतवार को कर दिया.
क्या इबादत या पूजा करने पर नौकरी जा सकती है?
अदालतों के रिकॉर्ड बताते हैं कि कुछ मामलों में कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई है, लेकिन वजह सिर्फ धर्म नहीं थी. ड्यूटी छोड़ना, बार-बार नियम तोड़ना और चेतावनियों की अनदेखी जैसे वजहें अहम रही हैं. अदालतों ने कहा कि मजहबी आजादी का इस्तेमाल अनुशासन से बचने के लिए नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत जिम्मेदारियां एक-दूसरे से अलग नहीं हैं. किसी भी अधिकार की सीमा वहां तक है, जहां वह दूसरों के अधिकारों या कार्य व्यवस्था में बाधा न बने. यही सिद्धांत कार्यस्थलों पर भी लागू होता है.
भारत में मजहबी आजादी मौलिक अधिकार है, लेकिन नौकरी के दौरान यह पूरी तरह असीमित नहीं होती.उदाहरण के तौर पर, सुप्रीम कोर्ट के Bijoy Emmanuel केस में छात्रों को मजहब की वजह से राष्ट्रगान गाने से मना करने की इजाजत दी गई, क्योंकि उनका व्यवहार शांतिपूर्ण था और अनुशासन नहीं टूट रहा था. वहीं, कुछ मामलों में अदालतों ने संस्थान के नियमों को तरजीह दी है. जैसे सेना से जुड़े एक केस में अधिकारी ने मजहबी वजहों से आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार किया, तो कोर्ट ने कहा कि सेना में अनुशासन सर्वोपरि है और कार्रवाई सही है. इसी तरह निजी कंपनियाँ भी ड्रेस कोड या कार्यस्थल की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सीमाएं तय कर सकती हैं. यानी अदालत संतुलन देखती है. मजहबी अकीदत Genuine हो, लेकिन अगर उससे कामकाज, सुरक्षा या अनुशासन प्रभावित होता है, तो संस्थान के नियम लागू रहेंगे.
आखिरी लकीर क्या कहती है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील ज्ञान रंजन मिश्रा कहते हैं कि "भारत का संविधा धार्मिक आज़ादी देता है, लेकिन हर अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है. कार्यस्थल पर अकीदत का सम्मान जरूरी है, मगर अनुशासन और संस्थान के नियमों से ऊपर कोई नहीं हो सकता." उन्होंने कहा कि संविधान किसी नागरिक को वहीं तक आजादी देता, जब तक दूसरों को परेशानी न हो. ज्ञान रंजन आगे कहते हैं कि "इस तरह के मामलों में कोर्ट का संदेश साफ है. दिल में धर्म, डेस्क पर जिम्मेदारी. ऑफिस में अधिकार से ज्यादा नियम चलते हैं."
अदालतों ने मजहबी अकीदत पर रोक नहीं लगाई है, बल्कि संतुलन की बात कही है. निजी कंपनियों में इजाजत और कंपनी नीति अहम है, जबकि सरकारी नौकरी में सेवा नियम सर्वोच्च माने जाते हैं. नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई वैध हो सकती है, लेकिन सिर्फ धर्म के आधार पर भेदभाव होने पर न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है. भारत में सभी मजहब के लोगों के अकीदत का सम्मान है, लेकिन दफ्तरों में जिम्मेदारी और अनुशासन को तरजीह दी जाती है. यही अदालतों की अब तक की स्पष्ट व्याख्या रही है.
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