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Jammu Kashmir Rajya Sabha Election 2025: जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद राज्यसभा के लिए हुए पहले चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस (NC) ने शानदार प्रदर्शन किया. शुक्रवार (24 अक्टूबर) को हुए राज्यसभा चुनाव में प्रदेश में तीन सीटें अपने नाम कीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सारे दावे, अटकलें और सियासी समीकरण फेल हो गए और वह उम्मीद के मुताबिक, महज एक सीट पर ही जीत हासिल कर सकी.
पूर्ववर्ती राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजन के बाद हुए इस चुनाव को काफी अहम माना जा रहा है. राज्यसभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस से चौधरी मोहम्मद रमजान, सज्जाद अहमद किचलू और गुरविंदर सिंह ओबेरॉय शानदार जीत हासिल की है. दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी बीजेपी से सत शर्मा ने जीत दर्ज की है. आइये जानते हैं, उन मुस्लिम नेताओं का सियासी सफर और पृष्ठभूमि, जिसने जम्मू कश्मीर की सियासत में अलग छाप छोड़ी है.
चौधरी मोहम्मद रमजान (75) का शुमार जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं में होता है. वह चार बार विधायक रह चुके हैं और राज्य में मंत्री पद भी संभाल चुके हैं. रमजान ने पहली बार 1983 में कुपवाड़ा जिले की हंदवाड़ा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर सियासत में अपनी पहचान बनाई. इसके बाद उन्होंने 1987 और 1996 के चुनावों में भी इस सीट पर जीत दर्ज की.
साल 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2008 में वह दोबारा विधानसभा पहुंचे. हालांकि, 2014 और 2024 के विधानसभा चुनावों में उन्हें सज्जाद गनी लोन के हाथों हार का सामना करना पड़ा. 1996 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार में वह मंत्री पद पर रहे थे. रमजान को एक जमीनी नेता और नेशनल कांग्रेस के पुराने भरोसेमंद चेहरों में गिना जाता है.
सज्जाद अहमद किचलू (60) जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के एक प्रभावशाली सियासी परिवार से हैं. उनके पिता बशीर अहमद किचलू नेशनल कांफ्रेंस के बड़े नेता रहे हैं और 1980 के दशक में और 1996 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार में मंत्री पद संभाला था. साल 2001 में उनकी मौत के बाद सज्जाद किचलू ने सियासत में कदम रखा.
किचलू ने 2002 के विधानसभा चुनाव में किश्तवाड़ सीट से जीत दर्ज की और 2008 में दोबारा विधायक बने. हालांकि, 2014 और 2024 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. सज्जाद किचलू 2015 में जम्मू-कश्मीर विधान परिषद के सदस्य के रूप में चुने गए थे. अपने सियासी करियर में उन्होंने सामाजिक और क्षेत्रीय मुद्दों को मजबूती से उठाते रहे हैं.