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Jokihat Assembly Election 2025: सियासत अक्सर सबसे करीबियों के रिश्तों को भी कसौटी पर खड़ा कर देती है. भाइयों और रिश्तेदारों के बीच सत्ता की भूख और सत्ता की चाहत के चलते टकराहटें पैदा होती हैं. खून के रिश्ते, प्यार और अपनापन यहां झुक जाते हैं और भावनाओं की जगह मक्कारी और कुर्सी की लालच जगह ले लेती है. यह कोई हालिया दिनों से या किसी एक मजहब, खास जगह या इलाके से जुड़ा हुआ नहीं, जहां लोग सत्ता या हुकूमत की लालच में अपनों से ही बगावत कर देते हैं.
सत्ता और हुकूमत के लिए अपनों से जंग और बगावत इंसानी जिंदगी के उद्भव से ही चली आ रही है. महाभारत, मुगलिया काल, अजात शत्रु, रोमन गृहयुद्ध, क्लियोपेट्रा और टॉलेमी भाइयों में जंग, चीन में हान राजवंश के पतन के बाद ल्यू बाई और उनके भाईयों में जंग, इंग्लैंड में रोजेज का जंग, रुस में इवान चतुर्थ, भारत में बाजीराव द्वितीय और उनके चचेरे भाई में जंग और साल 2010-11 में यमन में सालेह और हादी परिवार की जंग से पूरी दुनिया वाकिफ है. कमोबेश इसी तरह का सत्ता संघर्ष बिहार के अररिया जिले के जोकीहाट में देखने को मिल रही है.
जोकीहाट विधानसभा में इस समय तीन पूर्व मंत्रियों के साथ कई दिग्गज हस्तियां आमने सामने हैं. हालांकि, सबकी नजर जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी और पूर्व मंत्री सरफराज आलम और वर्तमान विधायक शाहनवाज आलम पर टिकी हैं. सरफराज आलम और शाहनवाज आलम सगे भाई हैं. उनके वालिद तस्लीमुद्दीन का शुमार न सिर्फ अररिया बल्कि बिहार के सियासी दिग्गजों में होती है. तस्लीमुद्दीन सांसद, विधायक और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. साल 2017 में तस्लीमुद्दीन की मौत हो गई थी, जिसके बाद 2017 में अररिया लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उनके बड़े बेटे सरफराज आलम ने जीत हासिल की थी.
सीमांचल के चर्चित राजनेता स्वर्गीय तस्लीमुद्दीन के बड़े बेटे सरफराज आलम ने 1996 में सियासत में कदम रखा. उन्हें चार बार जोकीहाट विधानसभा का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. इसके अलावा 2018 में अररिया लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का मौका भी मिला. हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी के प्रदीप कुमार सिंह से हार का सामना करना पड़ा.
सरफराज आलम का विधानसभा में पहला और दूसरा कार्यकाल आरजेडी के तौर पर रहा, जबकि तीसरा और चौथा कार्यकाल उन्होंने जेडीयू के प्रत्याशी के रूप में किया. 2018 में जेडीयू और बीजेपी के गठबंधन के बाद उन्होंने आरजेडी का दामन थाम लिया. लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी प्रत्याशी के रूप में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. उस चुनाव में उनके छोटे भाई शाहनवाज आलम ने एआईएमआईएम के टिकट पर चुनाव लड़ा और सरफराज को हराकर जोकीहाट की सियासत में धमाकेदार एंट्री की.
साल 2020 विधानसभा चुनाव में शाहनवाज आलम को 59,596 मत मिले, जबकि सरफराज आलम को 52,213 और बीजेपी के रंजीत यादव को 48,933 वोट मिले. इस जीत के बाद शाहनवाज आलम बिहार सरकार में आपदा प्रबंधन विभाग के मंत्री बने. बाद में एआईएमआईएम के अन्य पांच विधायकों के राजद में शामिल होने में शाहनवाज आलम की अहम भूमिका रही, जिससे वे आरजेडी के विश्वासी नेता बन गए.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी ने शाहनवाज आलम को उम्मीदवार बनाया. हालांकि, उन्हें 5,80,052 मत मिले, फिर भी बीजेपी के प्रदीप कुमार सिंह ने 6,01,146 मतों से उन्हें हराया. वहीं, 2025 विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने शाहनवाज आलम को जोकीहाट से प्रत्याशी बनाया है.
सरफराज और शाहनवाज आलम के बीच की सियासी जंग ने सीमांचल की सियासी में भाई-भाई के टकराव को उजागर किया है. जहां सरफराज आलम लंबे समय तक जोकीहाट और अररिया का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, वहीं छोटे भाई शाहनवाज ने एआईएमआईएम के माध्यम से अपनी सियासी पहचान बनाई और बाद में आरजेडी में शामिल होकर सत्ता के निकट बने.
पत्रकार और पॉलिटिकल एडवाइजर रागिब राजा ने इन दोनों भाइयों की आपसी कलह और सियासी करियर को लेकर कई खुलासे किए. उन्होंने बताया कि सरफराज और शाहनवाज से परे हटकर भी इस वक्त जोकीहाट प्रदेश की हाट सीट बनी हुई है. रागिब ने इसकी वजह तीन मंत्रियों के यहां से किस्मत आजमाने को वजह बताई. यहां से जेडीयू ने पूर्व मंत्री मंजर आलम ताल ठोक रहे हैं.
पूर्व केंद्रीय मंत्री तसलीमुद्दीन के दोनों बेटों में 2020 से फूट शुरू हो गई है. बताया जा रहा है कि इसकी वजह खुद सरफराज हैं. रागिब राजा के मुताबिक, सरफराज ने 2020 विधानसभा चुनाव में अपने भाई शाहनवाज का टिकट कटवा कर आरजेडी से खुद यहां से चुनावी मैदान में कूद पड़े. आरजेडी से टिकट न मिलने पर शाहनवाज आलम ने एआईएमआईएम के टिकट पर चुनाव लड़ा और अपने सरफराज को मात दी. इसको लेकर उनके परिवार और समर्थकों में विरोध देखने को मिला कि भले ही सरफराज 2019 लोकसभा चुनाव हार गए थे, उन्हें भाई के मुकाबले विधानसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहिए बल्कि अगले चुनाव की तैयारी करनी चाहिए थी.
पॉलिटिकल एडवाइजर रागिब राजा की मानें तो सरफराज और शाहनवाज की लड़ाई पारिवारिक है और इसकी वजह सरफराज की बीवी और उनके भाई हैं. नाम ना छापने की शर्त पर स्थानीय लोग भी दबी जुबान में यह बात स्वीकार करते हुए नजर आते हैं. वहीं, रागिब बताते हैं कि AIMIM से जीतने के महज कुछ दिनों पर वह चार विधायकों को लेकर आरजेडी में शामिल हो गए. 2024 के चुनाव में अपने सरफराज को पछाड़ आरजेडी आलाकमान का भरोसा जीत लिया.
शाहनवाज को 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी प्रदीप कुमार सिंह से 200,94 वोटों से हार का सामना करना पड़ा, इसके लिए उनके भाई को जिम्मेदार ठहराया गया. रागिब ने बताया कि जोकीहाट में सरफराज की वोटर्स पर अच्छी पकड़ है और उन्होंने इसका फायदा उठाते हुए शाम, दाम, दंड भेद के जरिये वोटर्स को दूसरे पार्टियों के पक्ष में मोड़ दिया. यही शाहनवाज की हार की वजह बनी. सरफराज ने इस बार विधायकी का टिकट पाने के लिए जेडीयू, आरजेडी समेत कई दलों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन आखिर में वह जन सुराज से टिकट हासिल करने में कामयाब रहे. सत्ता के इस जंग में सबकी नजरें दोनों भाइयों पर टिकी हैं.