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Kamil-Fazil hearing in SC: उत्तर प्रदेश के मदरसों में फाजिल (पोस्टग्रेजुएट) और कामिल (ग्रेजुएय) कोर्स कर रहे हजारों स्टूडेंट्स के मुस्तकबिल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई होने जा रही है. टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया के जरिए दाखिल की गई याचिका में मांग की गई है कि कोर्ट राज्य सरकार को निर्देश दे कि वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय को इन डिग्रियों की परीक्षा आयोजित करने और डिग्री देने का अधिकार दे.
बता दें, पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में यूपी मदरसा शिक्षा अधिनियम को संवैधानिक मानते हुए इसे वैध करार दिया था. हालांकि, कामिल और फाजिल डिग्रियों को इस आधार पर मान्यता नहीं दी गई थी कि ये यूजीसी एक्ट के मानकों के मुताबिक नहीं है. इस फैसले के बाद प्रदेश में करीब 37,000 छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है..
देश के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय से मदरसों में फाजिल और कामिल कोर्स पढ़ाए जाते रहे हैं, जिन्हें पारंपरिक इस्लामी शिक्षा के तहत उच्चस्तरीय डिग्री माना जाता है. फाजिल को पोस्टग्रेजुएट और कामिल को ग्रेजुएट स्तर की डिग्री के बराबर समझा जाता रहा है. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश के मुताबिक, ये डिग्रियां यूजीसी (University Grants Commission) के तय मानकों के तहत नहीं आतीं, इसलिए इन्हें औपचारिक हायर एजुकेशन की डिग्री नहीं माना जा सकता.
टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया की याचिका में मांग की गई है कि प्रदेश सरकार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती एजुकेशन यूनिवर्सिटी को कामिल और फाजिल की डिग्री देने के लिए अधिकृत करे. इससे इन डिग्रियों को वैधता मिलेगी और छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार व उच्च शिक्षा में भागीदारी कर सकेंगे.
मामले को लेकर मदरसों में पढ़ने वाले हजारों छात्रों में बेचैनी है. उनका कहना है कि सालों की मेहनत और पढ़ाई का कोई औपचारिक मूल्य नहीं रह गया है. यदि जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला, तो इन छात्रों का भविष्य शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा से कट सकता है.
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आज की सुनवाई पर टिकी हैं. अगर कोर्ट सरकार को विश्वविद्यालय के माध्यम से परीक्षा आयोजित कर डिग्री देने की अनुमति देता है, तो यह फैसला न केवल यूपी, बल्कि देशभर के मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए एक बड़ी राहत बन सकता है.