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Lal Khat Ceremony in West UP Muslims Marriage: हिंदुस्तान में शादी सिर्फ दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन मानी जाती है. हर प्रदेश की अपनी रिवायते हैं जो उसे खास बनाती हैं. इन्हीं में से एक दिलचस्प और जज़्बाती रिवायत है- 'लाल खत' की, जो खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समाज में शादियों का अहम हिस्सा है. यह परंपरा न केवल शादी की बाज़ाब्ता ऐलान होता है, बल्कि आपसी रिश्तों की मिठास और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक भी है.
'लाल खत' एक तरह का शादी का न्योता होता है, जिसे पारंपरिक तौर पर लाल रंग के कागज या लिफाफे पर लिखा जाता है. पुराने वक्त में जब सोशल मीडिया या फोन कॉल्स आम नहीं थे, तब शादी की खबर देने का यही सबसे काबिले एहतराम और रिवायती तरीका माना जाता था.
दुल्हन के घर वाले लाल रंग के हार्ड कागज़ या लाल कपड़े पर शादी से जुड़ी पूरी डिटेल लिखवाते हैं. इसके बाद इसे लेकर लड़के के यहां जाया जाता है. दुल्हा के परिवार वाले अपने सभी करीबियों और पड़ोसियों को इकट्ठा करते हैं और फिर इसे पढ़कर सुनाया जाता है. यह शादी के ऐलान के तौर पर माना जाता है.
इस खत की शुरुआत किसी दुआ या फिर कुरान की आयत के साथ होती है. मिसाल के तौर पर 'बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम' यानी शुरू अल्लाह के नाम से जो निहायत रहम और करम करने वाला है.

लाल रंग भारतीय संस्कृति में शुभता, प्रेम और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि खत का रंग लाल चुना गया. यह रंग सिर्फ स्याही या कागज तक सीमित नहीं है- यह एक भावना का रंग है, जो शादी के जोश, उत्साह और खुशी को दर्शाता है.
पहले के समय में लाल खत हाथ से लिखा जाता था. मोहल्ले के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति या मौलवी से इसे सुंदर उर्दू या हिंदी में लिखा जाता था. अब आमतौर पर इसके डिजिटल फॉर्मेट्स मौजूद है, जिसमे किसी हार्ड पेपर पर प्रिंट करा लिया जाता है. कुछ जगहों पर यह कपड़े पर प्रिंट कराया जाता है. खत को एक खूबसूरत लिफाफे या बॉक्स में रखकर भेजा जाता है. कुछ लोग इस बॉक्स में ड्राईफ्रू्ट्स या मिठाई रखते हैं.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों- जैसे मेरठ, मुज़फ्फरनगर, बागपत, शामली, बुलंदशहर, और सहारनपुर में लाल खत भेजने की रस्म आज भी एक सामाजिक आयोजन की तरह निभाई जाती है. रिश्तेदारों और पड़ोसियों को अपने घर पर बुलाया जाता है और ऐलान के बाद मिठाई बांटी जाती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शादियों में लाल खत की परंपरा सिर्फ एक सांस्कृतिक रिवाज नहीं, बल्कि इंसानियत, अपनापन और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक है.