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Maulana Ishaq Gora on Kids: जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देश के प्रसिद्ध देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने बच्चों की परवरिश में बढ़ती लापरवाहियों पर फिक्र का इज़हार किया है. हाल ही में जारी एक वीडियो बयान में उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में बच्चों की तालीम-ओ-तरबियत से जुड़े कई ऐसे रुझान दिखाई दे रहे हैं जो आगे चलकर बच्चों के अख़लाक़, सोच और पूरी शख़्सियत पर नकारात्मक असर डालते हैं.
मौलाना ने कहा कि आजकल एक आम दृश्य यह है कि जब बच्चा रोए, बेचैन हो या खाना न खाए, तो उसे चुप कराने के लिए तुरंत मोबाइल दे दिया जाता है. उन्होंने इसे सबसे नुकसानदेह तरीक़ों में से एक बताते हुए कहा कि कई माता-पिता इस बात पर ध्यान ही नहीं देते कि बच्चा क्या देख रहा है, उसके ज़ेहन पर किस तरह की छाप पड़ रही है और मोबाइल कंटेंट उसके मुताबिक़ कितना मुनासिब है.
उनके मुताबिक, "बच्चा अपनी आँखों से जो देखता है, वह दिल पर उतर जाता है, और जो दिल पर उतर जाए, उसे मिटाना आसान नहीं होता."
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इस्लामी तालीमात में मां की गोद को बच्चे का पहला मदरसा कहा गया है, जहां से उसकी पहली सीख, पहला सबक और पहला असर मिलता है. ऐसे में अगर शुरुआती माहौल मोबाइल, कार्टून, बे-तमीज़ कंटेंट और शोर-शराबे से भर जाए, तो बच्चों से मजबूत अख़लाक़ और बेहतरीन आदतों की उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है.
मौलाना ने एक दूसरी आम गलती की ओर भी ध्यान दिलाया कि बहुत-सी माएं बच्चों को डराकर चुप कराती हैं. कई बार यह कहते सुना जाता है चुप हो जा, अल्लाह की रहमत पकड़ लेगी. उन्होंने इसे गलत और बच्चे की मानसिक तरबियत के लिए नुकसानदेह बताया.
मौलाना ने ज़ोर देते हुए कहा कि अल्लाह की रहमत डराने की चीज़ नहीं, सहारा देने वाली चीज़ है. जो मां अपने बच्चे को रहमत से डराती है, उसे अपने तरीक़े की इस्लाह करने की सख़्त ज़रूरत है. उनके अनुसार, बच्चे के दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ नहीं बल्कि अल्लाह की मोहब्बत, रहमत और रहनुमाई बैठनी चाहिए. डर से बच्चा उस समय चुप तो हो जाएगा, लेकिन आगे चलकर दीन से उसके रिश्ते पर असर पड़ सकता है.
मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने माता-पिता से कुछ अहम सवाल खुद से पूछने की अपील की. उन्होंने कहा कि क्या हम बच्चों की रुहानी, नैतिक और दीनी ज़रूरतों पर वाक़ई ध्यान दे रहे हैं? क्या हम अपनी सहूलियत के लिए उनके भविष्य से समझौता तो नहीं कर रहे? क्या हम तरबियत के नाम पर झूठ, डर और गलत तरीक़ों का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे?
उन्होंने कहा कि आज के दौर में ज़रूरत इस बात की है कि इस्लामी उसूलों को सही तरह समझा जाए और उन्हें घरों में लागू किया जाए. बच्चे अल्लाह की तरफ़ से मिली क़ीमती अमानत हैं- इनकी तरबियत को हल्के में लेना न सिर्फ़ ग़फ़लत है, बल्कि एक अहम ज़िम्मेदारी से इंकार भी है.