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औरतों की तरक्की में इस्लाम नहीं, मौलाना हैं बाधा; महिला आरक्षण के फुल सपोर्ट में मुस्लिम औरतें

Women Reservation In parliament: संसद और विधानमंडलों में महिला आरक्षण पर मौलाना शाहबुद्दीन रिज़वी के बयान के बाद मुस्लिम औरतें खुलकर इसके समर्थन के आ गई हैं. उनका कहना है कि इस्लाम में औरतों को कारोबार या सियासत करने से कभी नहीं रोका गया है, बल्कि ये सब मौलाना लोगों का बनाया हुआ कानून है. इस कानून से तमाम महिलाओं के साथ मुस्लिम महिलाओं का भी फायदा होगा.  

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के मुद्दे पर जहाँ पिछड़े वर्ग की महिलाओं को आरक्षण देने का सवाल उठा दिया गया है, वहीँ समाजवादी पार्टी ने इसमें मुस्लिम महिलाओं को भी जोड़ने और उन्हें रिजर्वेशन देने की मांग कर मुद्दे को और गरमा दिया है. गृहमंत्री अमित शाह ने इस मामले में साफ़ कर दिया है कि धर्म के आधार पर मुसलमानों को किसी तरह का आरक्षण सरकार नहीं देगी, क्योंकि संविधान में इसका कोई प्रावधान ही नहीं है.

वहीँ, बरेली के एक मौलान शाहबुद्दीन रिज़वी ने इस बीच ये कहकर एक नया विवाद पैदा कर दिया है कि मुस्लिम महिलाओं को सियासत से दूर रहना चाहिए, क्योंकि मौजूदा दौर की सियासत छल और कपट से भरी हुई है, और यह एक दलदल की तरह है, जहां सम्मान और गरिमा बनाए रखना मुश्किल हो सकता है. 

मौलान के इस बयान के बाद मुस्लिम महिलाएं लागतार शाहबुद्दीन रिज़वी पर हमलावर हो रही हैं, और उनकी आलोचना कर रही हैं.
ट्रिपल तलाक विक्टिम अबोलुशन सोसाइटी की सद्र डॉक्टर सदफ फातिमा ने कहा कि वो मौलाना की बातों से कोई इत्तिफाक नहीं रखती हैं. इस्लाम में तो औरतों को समाज सेवा और हर काम में मर्दों को मशविरा देने का राईट दिया गया है. इस्लाम में सियासत से औरतों को कभी नहीं रोका गया है. औरतें सियासत में आएंगी तो वो औरतों के मसले को अच्छे से उठा सकती हैं, और उसका हल पेश कर सकती हैं. 

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सामाजिक कार्यकर्त्ता अफशां बेगम ने कहा कि हम प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करते हैं कि वो औरतों को इस तरह का मौका दे रहे हैं. मुस्लिम महिलाओं के लिए भी इस्लाम इसमें कोई आड़े नहीं आता है. इस्लाम ने कभी किसी औरत को हुक्मरानी के लिए नहीं रोका है. इस्लाम तो औरतों को आगे आने के लिए प्रेरित करता है. इससे महिलाओं के हालात सुधरेंगे, वो अपनी समस्याओं को समाधान खुद करेंगी. 

महिला वकील रशीदा बी ने बताया कि शरियत में तो इद्दत में रहने वाली महिलाओं को भी रोजगार करने की इज़ाज़त है, तो औरतों को सियासत से कैसे रोका जा सकता है. हजरत खदीजा (र.) ने खुद तिजारत करती थी, और वो जंग के मैदान में सैनिकों की सेवा करने जाती थी, तो आप कैसे कह सकते हैं कि इस्लाम इस राह में कोई बाधा पैदा करता है. अभी महिलाओं को किसी काम या परेशानी होने पर वो पुरुष विधायकों, सांसदों या मंत्रियों के पास जाती हैं, जब महिलाएं आएँगी तो वो महिलाओं के पास जाएंगी. इससे अच्छी बात और क्या होगी? महिलाएं महिला जनप्रतिनिधियों से खुलकर बात कर पाएंगी, अपनी समस्याएं सुना पाएंगी. सरकार का ये बेहद शानदार कदम है. 

मीडिया प्रोफेशनल कुदसिया बेगम ने कहा कि ये तो सरकार इस्लाम के मुताबिक कानून बना रही है. इस्लाम औरतों का काम औरतों से कराने को प्रशय देता हैं. पुरुषों पर आत्मनिर्भरता कम होगी तभी तो महिलाएं आगे बढ़ेंगी. महिलाएं सुरक्षित होंगी. सरकार के इस कदम की सभी को तारीफ करनी चाहिए, इसका खैर मकदम किया जाना चाहिए. 

आईटी प्रोफेशनल शगुफ्ता नाज़ ने बिहार का हवाला देते हुए बताया कि वहां पर पंचायत चुनावों और शहरी बल्दियाती चुनावों में काफी पहले से 33 फीसदी आरक्षण लागू है. वहां हर समाज की महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं, और लोकल प्रशासन में सहयोग कर रही हैं. इनमें ढेर सारी मुस्लिम महिलाएं भी होती हैं. बिहार में महिलाओं के हालात में काफी सुधार हुआ है. जब देश की संसद और विधान सभाओं में ये नियम लागू होगा तो इससे बड़े पैमाने पर औरतों की स्थिति में सुधार होगा.

शिक्षिका इरम शेख ने कहा कि पाकिस्तान, तुर्की, बांग्लादेश से लेकर अमेरिका तक में मुस्लिम महिलाएं सियासत में आ रही हैं, जिन्हें देखकर लोग जश्न मनाते हैं.आज़ाद भारत में भी बहुत सी मुस्लिम औरतें संसद सदस्य रही हैं.विधानसभाओं में उनकी मौजूदगी रही है. अगर कानून बनता है, तो उनकी मौजूदगी में इजाफा होगा. ये तो औरतों के हक़ में होगा कि वो देश की आधी आबादी की समस्याओं को खुद एड्रेस करेंगी और खुद उनका हल निकालने के लिए कदम उठाएंगी. इस्लाम इस्लाम कहीं, कोई रुकावट पैदा नहीं करता है, औरतों की तरक्की की राह इस्लाम नहीं बल्कि मौलाना रोकते हैं. 

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