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Power of Attorney: भारतीय कानून में कई ऐसे उर्दू शब्द अब भी प्रचलित हैं, जो आम तौर पर कानूनी दस्तावेजों में इस्तेमाल होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है 'मुख्तारनामा'. इसे हिंदी में अधिकार पत्र और अंग्रेजी में Power of Attorney (POA) कहा जाता है. हाल के समय में सरकार कानूनी दस्तावेजों से उर्दू शब्दों को हटाने की कोशिश कर रही है, लेकिन आम लोगों और वकीलों के लिए यह शब्द आज भी रोजमर्रा की जिंदगी और कानूनी प्रक्रियाओं में बेहद प्रचलित है. आइये समझते हैं क्या है मुख्तारनामा?
मुख्तारनामा एक लिखित दस्तावेज है, जिसके जरिए कोई शख्स किसी अन्य भरोसेमंद शख्स को अपने निजी, कॉमर्शियल या कानूनी मामलों के लिए नुमाइंदा बनाने का अधिकार देता है. इसका मतलब है कि प्रिंसिपल (अधिकार देने वाला) किसी एजेंट (अधिकार लेने वाला) को अपनी जगह पर किसी काम को पूरा करने का कानूनी अधिकार देता है. यह अधिकार संपत्ति के लेन-देन, बैंकिंग, व्यापार, कानूनी मामलों और अन्य प्रशासनिक कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
दरअसल, मुख्तारनामा शब्द दो हिस्सों से मिलकर बना है. पहला है 'मुख्तार'- यह अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है अधिकार हासिल करने वाला शख्स, प्रतिनिधि या नियुक्त किया गया इंसान. यानी वह शख्स जिसे किसी और की ओर से काम करने की शक्ति दी गई हो. दूसरा हिस्सा है 'नामा'-यह फारसी प्रत्यय है, जिसके मायने हैं चिट्ठी या लिखित दस्तावेज या बयान.
इसी 'नामा' से कई और कानूनी और सामाजिक शब्द बने जैसे अरजनामा (याचिका पत्र), राज़नामा (गुप्त पत्र) और इकरारनामा (एग्रीमेंट या कबूलनामा) बने हैं. यानी 'मुख्तारनामा' सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि भारतीय कानूनी और भाषायी परंपरा का वह हिस्सा है, जो अरबी और फारसी के मेल से बना और आज भी जिंदा है.
इतिहासकारों के मुताबिक, यह शब्द भारत में मुगलकालीन दौर में ज्यादा प्रचलन में आया, जब फारसी राजभाषा थी और अदालतों से लेकर जमीन-जायदाद के कागजात तक इसी भाषा में तैयार होते थे. ब्रिटिश काल में भी 'मुख़्तारनामा' का इस्तेमाल कानूनी दस्तावेज़ों में होता रहा. आज भी कई अदालतों और नोटरी कागजात में यह शब्द देखने को मिलता है. हालांकि आधुनिक कानून में इसके लिए ज़्यादा प्रचलित शब्द Power of Attorney इस्तेमाल होता है.
मुख्तारनामा खास तौर पर दो तरह के होते हैं, जिसे रोजमर्रा की जिंदगी में एक दूसरे के बीच समझ और मजबूत-विश्वसनीय सहमति पैदा करने के लिए किया जाता है. उनमें से एक है 'जनरल पॉवर ऑफ अटॉर्नी' और दूसरी है 'स्पेशल पॉवर ऑफ अटॉर्नी.'
जनरल पॉवर ऑफ अटॉर्नी (GPA)
जब प्रिंसिपल अपने एजेंट को एक से ज्यादा काम करने का अधिकार देता है, जैसे प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त, लेन-देन, सरकारी भुगतान, कॉन्ट्रैक्ट्स या लीज, तो इसे जनरल पॉवर ऑफ अटॉर्नी कहते हैं. जीपीए का इस्तेमाल आम तौर पर लंबे समय के लिए और व्यापक कामों के लिए किया जाता है.
स्पेशल पॉवर ऑफ अटॉर्नी (SPA)
जब प्रिंसिपल किसी खास काम के लिए एजेंट को अधिकार देता है, जैसे किसी कोर्ट में प्रतिनिधित्व करना या किसी खास सरकारी भुगतान का काम करना, तो इसे स्पेशल पॉवर ऑफ अटॉर्नी कहा जाता है. इसका इस्तेमाल सीमित और खास कामों के लिए किया जाता है.
जनरल पॉवर ऑफ अटॉर्नी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है, लेकिन रजिस्टर्ड होने पर इसका कानूनी महत्व बढ़ जाता है. खासकर जब मामला अचल संपत्ति से जुड़ा हो. रजिस्ट्रेशन के लिए कम से कम दो गवाहों की मौजूदगी जरूरी है. जिन जगहों पर रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 लागू है, वहां यह सब-रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर्ड किया जाता है. अन्य जगहों पर इसे नोटरी या प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से भी प्रमाणित किया जा सकता है.
विदेश में यह दस्तावेज सादे कागज पर बनाया जा सकता है, लेकिन इसे नोटरी या भारतीय काउंसल के माध्यम से नोटराइज्ड कराना जरूरी होता है. इसके बाद भारत में तीन महीने के भीतर संबंधित सब-रजिस्ट्रार के समक्ष इसे रजिस्टर्ड कराना जरुरी है. इससे यह दस्तावेज भारत में कानूनी रूप से मान्य हो जाता है.
मुख्तारनामा भारतीय कानून में एक अहम दस्तावेज है, जो किसी शख्स को अपने प्रतिनिधि के माध्यम से अपने अधिकार और जिम्मेदारियों को सुरक्षित रखने में मदद करता है. यह खास तौर पर उन मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां प्रिंसिपल खुद हाजिर नहीं हो सकता या किसी खास काम को पूरा करने के लिए एक्सपर्ट की मदद लेना चाहता है.
मुख्तारनामा आज भी कानूनी और वित्तीय दुनिया में एक महत्वपूर्ण उपकरण है. सरकार की कोशिशों के बावजूद, यह शब्द और प्रक्रिया आम लोगों और वकीलों के बीच जिंदा है और रोजमर्रा के लेन-देन, संपत्ति और कानूनी मामलों में बेहद प्रासंगिक बनी हुई है.
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