Hindu Scholars Studied in Madarsa: बीजेपी शासित राज्यों में चरमपंथ से जुड़े होने के बहाने मदरसों को बंद किया जा रहा है, जबकि इतिहास बताता है कि राजा राम मोहन रॉय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद और राम मनोहर लोहिया जैसे कई महान हिंदू विद्वानों ने मदरसों में तालिम हासिल की है और अपना नाम इतिहास के पन्नों में अमर कर गए. पूरी खबर पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें.
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Madarsa Education in India: बीजेपी शासित राज्यों में मदरसे लगातार बीजेपी सरकार के निशाने पर रहे हैं. असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य के सभी मदरसों को पूरी तरह बंद कर दिया. असम सरकार ने तर्क दिया कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को कट्टरपंथी बनाया जा रहा था. वहीं, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हजारों मदरसों को बुलडोजर से गिरा दिया गया है.
बीजेपी नेता और हिंदू संगठन अक्सर मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को आतंकवाद से जोड़ते हैं. हालांकि, आज हम आपको उन हिंदू विद्वानों के बारे में बताएंगे जिन्होंने मदरसों में पढ़ाई की और इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया. आइए जानते हैं.
राजा राम मोहन राय
दरअसल, भारत में मदरसा शिक्षा सिर्फ़ मुसलमानों तक ही सीमित नहीं रही है. ऐतिहासिक रूप से कई हिंदू विद्वानों, समाज सुधारकों और नेताओं ने भी मदरसों में पढ़ाई की है. इस सिलसिले में सबसे पहला नाम राजा राम मोहन राय का आता है, जिन्हें भारतीय पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है. उन्होंने पटना और मुर्शिदाबाद के मदरसों में अरबी, फ़ारसी, इस्लामी दर्शन और तर्कशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी. यही वजह है कि वे संस्कृत, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी के विद्वान थे.
भगत सिंह के पिता ने मदरसे में की है पढ़ाई
भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह न सिर्फ एक जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट थे, बल्कि उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई एक मदरसे में की थी, जहां उन्होंने अरबी और फारसी पढ़ी थी. उस जमाने में मदरसों को उच्च शिक्षा का केंद्र माना जाता था, जहां भाषा और साहित्य में गहरी शिक्षा दी जाती थी. बाद में यह मदरसा शिक्षा किशन सिंह के बौद्धिक विकास और आज़ादी की लड़ाई में उनकी सक्रिय भागीदारी में बहुत काम आई.
मुंशी प्रेमचंद ने मदरसे में की पढ़ाई
मुंशी प्रेमचंद, जिन्हें हिंदी और उर्दू साहित्य का स्तंभ माना जाता है. उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा एक प्राइवेट मदरसे में ली, जहां उन्होंने उर्दू और फ़ारसी की गहराई से पढ़ाई की. मदरसे में मिली इस शिक्षा ने उनकी लेखन शैली को असाधारण मजबूती दी. यही वजह है कि उनकी उर्दू लेखन को बहुत प्रभावशाली, धाराप्रवाह और साहित्यिक गुणों से भरपूर माना जाता है.
स्वामी विवेकानंद के गुरु
श्री रामकृष्ण परमहंस, जिन्हें स्वामी विवेकानंद अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे, बचपन में अपने गांव के एक मदरसे में फारसी सीखने जाते थे. उस समय बंगाल क्षेत्र में फारसी को प्रशासनिक और विद्वानों की भाषा माना जाता था, इसलिए हिंदू परिवार भी अपने बच्चों को मदरसों में भेजते थे. फारसी के जरिए परमहंस को सूफी साहित्य और आध्यात्मिक विचारों की भी समझ मिली, जिससे उनका आध्यात्मिक दृष्टिकोण और भी समृद्ध हुआ.
राजा जय सिंह द्वितीय (महाराजा सवाई जयसिंह)
जयपुर के संस्थापक महाराजा जय सिंह द्वितीय न सिर्फ एक महान राजपूत शासक थे, बल्कि विज्ञान की गहरी समझ रखने वाले एक विद्वान भी थे. बचपन में उन्होंने मौलानाओं से फारसी और इस्लामी खगोल विज्ञान की तालिम हासिक की. बाद में उन्होंने कई मशहूर इस्लामी खगोल विज्ञान ग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद करवाया और इन बौद्धिक परंपराओं से प्रेरित होकर देश भर में वेधशालाएं स्थापित कीं.
राम मनोहर लोहिया
भारत के जाने-माने समाजवादी विचारक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ राम मनोहर लोहिया ने अपनी शुरुआती शिक्षा एक मदरसे में हासिल की थी. उन्होंने स्थानीय मौलवियों से फारसी और उर्दू की बुनियादी बातें सीखीं, जिससे उनकी भाषा कौशल और सामाजिक विविधता की समझ मज़बूत हुई. यही वजह है कि बाद में उन्होंने अपने जीवन में सांप्रदायिक सद्भाव, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक मजबूत राजनीतिक ढांचा बनाया.
हिन्दी के कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र
आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी शुरुआती शिक्षा एक मदरसे में एक मुल्ला से उर्दू और फ़ारसी में प्राप्त की थी. इस शुरुआती ट्रेनिंग ने उनकी भाषाई समझ पर गहरा असर डाला. फ़ारसी और उर्दू की उनकी समझ उनके कामों में पाई जाने वाली सहजता, बोलचाल की शैली और बहुभाषी प्रभावों में झलकती है, जिसने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी.