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79वें यौमे-आजादी से पहले मुल्क की आजादी की खातिर अपनी जान कुर्बान करने वाले और जालिम अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ डटकर लड़ने वाले कई मुस्लिम मुजाहिदीन-ए-आजादी आज नई नस्ल की यादों से धीरे-धीरे ओझल होते जा रहे हैं. ऐसे वक्त में उनकी तारीख की सुनहरी दास्तान को नई नस्ल तक पहुंचाने और उनकी कुर्बानियों से वाकिफ कराने की एक अनूठी मुहिम शुरू की गई है. इस पहल का मकसद सिर्फ तारीख बताना नहीं, बल्कि नई नस्ल के जेहन में उन बहादुर शख्सियतों की याद को हमेशा के लिए जिंदा करना है, जिन्होंने वतन की आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया.
आंध्र प्रदेश के गुंटूर के मशहूर हिस्टोरियन सैयद नसीर अहमद ने स्कूली बच्चों को आजादी के दीवानों से रूबरू कराने के लिए एक अलग अंदाज अपनाया है. उन्होंने किताबों पर लगाए जाने वाले नाम-पर्चों के जरिए बच्चों तक मुजाहिदीन-ए-आजादी की जिंदगी और उनकी कुर्बानियों की कहानी पहुंचाने की मुहिम शुरू की है. सहाफियों से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि बच्चों की किताबों पर लगाए जाने वाले नाम-पर्चे ऐसा आसान जरिया हैं, जिनके जरिये हर रोज बच्चे आजादी के नायकों के बारे में कुछ न कुछ जान सकेंगे.
आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में हजारों तलबा में बांटा जाएगा खास पर्चा
सैयद नसीर अहमद ने बताया कि हर नाम-पर्चे पर किसी एक मुजाहिदीन-ए-आजादी की रंगीन तस्वीर दी गई है. इसके साथ उनका नाम, जन्म और इंतिकाल के साल के साथ मुल्क की आजादी में उनके खास किरदार का एक मुख्तसर परिचय भी लिखा गया है. नाम-पर्चे में बच्चों के लिए अपना नाम, क्लास और स्कूल का नाम लिखने की जगह भी छोड़ी गई है, ताकि वही पर्चा उनकी किताब का हिस्सा बन जाए.
सैयद नसीर अहमद के मुताबिक, इस साल दानदाताओं और खैराती तंजीमों की माली मदद से एक लाख मुजाहिदीन-ए-आजादी के नाम वाले पर्चे छपवाए गए हैं. इन्हें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सैकड़ों स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों तलबा तक पहुंचाया जाएगा. हर तलबा को ऐसे छह नाम वाले पर्चे दिए जाएंगे, ताकि उसकी अलग-अलग किताबों पर अलग-अलग मुजाहिदीन-ए-आजादी की जानकारी मौजूद रहे.
मुजाहिदीन-ए-आजादी के तारीख से रूबरु कराने के लिए शुरू की गई खास मुहिम
नसीर अहमद ने कहा कि आम तौर पर बच्चे अपनी किताबों पर फिल्मी सितारों, क्रिकेट खिलाड़ियों, कार्टून किरदारों या कुदरती मंजरों वाले नाम-पर्चे लगाते हैं. लेकिन जब इन्हीं की जगह आजादी के दीवानों की तस्वीर और उनका मुख़्तसर तआरुफ होगा, तो न सिर्फ तलबा बल्कि उनके उस्ताद और घर वाले भी उन महान शख्सियतों के बारे में जानने के लिए मुतवज्जेह होंगे.
सैयद नसीर अहमद का कहना है कि स्कूल की किताबों का कवर कम से कम चार महीने तक वैसा ही रहता है. इस दौरान जब भी कोई बच्चा या टीचर किताब खोलेगा, उसकी नजर मुजाहिदीन-ए-आजादी की तस्वीर और तारुफ पर पड़ेगी. बार-बार देखने से यह जानकारी बच्चों के जेहन में गहरी छाप छोड़ देगी और उन्हें अपने मुल्क की तारीख से जुड़ने में मदद मिलेगी.
साल 2018 में उम्मीद से कहीं ज्यादा कामयाब रही ये मुहिम
उन्होंने बताया कि यह मुहिम पहली बार साल साल 2018 में शुरू किया गया था. उस वक्त इसे उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छी कामयाबी मिली. इसके बाद मुल्क के अलग-अलग हिस्सों से दानदाताओं, समाजसेवियों और खिदमत करने वाली तंजीमों का भरपूर सहयोग मिला. अब तक छह लाख नाम-पर्चे छापकर देशभर के सैकड़ों स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों तलबा के बीच तकसीम किए जा चुके हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि इस बार स्कूल 12 जून से खुल गए थे, इसलिए वक्त कम होने की वजह से पहले फेज में सिर्फ एक लाख नाम वाले पर्चे ही तैयार किए जा सके. समाजी तंज़ीमों, समाजी कारकुनों और टीचर्स के तआवुन से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इनको बांटने के लिए महीने के आखिरी हफ्ते तक टार्गेट रखा गया है.