)
NCERT New Modules on Partition of India: नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) लगातार स्कूली सिलेबस में बदलाव कर रहा है. हालिया दिनों मुस्लिम शासकों के बाद अब भारत के विभाजन को लेकर स्पेशल मॉड्यूल जारी किया है. इसमें कहा गया है कि देश के विभाजन के लिए काफी हद तक कांग्रेस नेतृत्व जिम्मेदार था. NCERT के स्पेशल माड्यूल के बाद एक बार फिर आरोपों का दौर शुरू हो गया है.
ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने NCERT के इस बदलाव पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. उन्होंने मांग की कि "शम्सुल इस्लाम की किताब 'मुस्लिम्स अगेंस्ट पार्टिशन' को NCERT में शामिल किया जाए." उन्होंने कहा कि विभाजन के बारे में बार-बार झूठ बोला जाता है.
सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि "उस समय 2 से 3 फीसदी मुसलमानों को भी वोट देने का अधिकार नहीं था और आज लोग विभाजन के लिए हमें दोषी ठहराते हैं, मुसलमानों को दोषी ठहराते हैं." उन्होंने कहा, "विभाजन के लिए हम (मुसलमान) इसके लिए कैसे जिम्मेदार हैं? जो यहां से भाग गए, वे भाग गए. जो वफादार थे, वे यहीं रहे."
दरअसल, NCERT ने एक मॉड्यूल जारी किया है, जिसमें देश के विभाजन के लिए कांग्रेस, जिन्ना और माऊंट बेटेन को जिम्मेदार ठहराया है. NCERT के मॉड्यूल्स के मुताबिक, कांग्रेस ने विभाजन की योजनाओं को स्वीकार कर लिया और जिन्ना को कम आंका, इतना ही नहीं विभाजन के बाद होने वाली भयंकर त्रासदी का अनुमान भी नहीं लगा पाई. इस साल अगस्त में 'विभाजन स्मरण दिवस' के मौके पर दो मॉड्यूल जारी किए हैं, जिसमें एक प्राइमरी स्टेज और दूसरा सेंकेड्री स्टेज है.
इन मॉड्यूल्स में बताया गया है कि भारत का बंटवारा कोई जरूरी या अनिवार्य घटना नहीं थी, बल्कि इसे कुछ खास फैसलों और लोगों की भूमिका ने इस अंजाम तक पहुंचाया है. इसके पीछे NCERT ने तर्क दिया है कि विभाजन के लिए तीन वजहें जिम्मेदार थी. जिनमें पहला मोहम्मद अली जिन्ना- जिसने धर्म के आधार पर विभाजन की मांग की, दूसरा कांग्रेस- जिसने इस मांग को स्वीकार किया और तीसरा गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन- जिसने विभाजन की मांग को औपचारिक रुप देकर, इसे लागू किया.
माध्यमिक मॉड्यूल में साफ लिखा है कि उस समय भारतीय नेताओं को शासन, प्रशासन, सेना और पुलिस जैसी ज़िम्मेदारियों का अनुभव नहीं था. इसलिए उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि बंटवारे के बाद कितनी बड़ी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. मॉड्यूल में यह भी कहा गया है कि अगर उन्हें यह पता होता, तो इतनी जल्दीबाजी नहीं की जाती.
इन मॉड्यूल्स में भारत के बंटवारे को "एक अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी" बताया गया है, जिसकी दुनिया में कोई दूसरी मिसाल नहीं है. इसमें लिखा गया है कि विभाजन की वजह से लगभग 1.5 करोड़ लोग बेघर हुए, लाखों हत्याएं हुईं, महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर यौन हिंसा हुई और ऐसी ट्रेनें भी देखी गईं जो शरणार्थियों की बजाय सिर्फ लाशों से भरी हुई पहुंचीं.
मॉड्यूल में बताया गया है कि विभाजन की हिंसा विभाजन से पहले ही शुरू हो चुकी थी. इसमें नोआखली और कलकत्ता (1946), रावलपिंडी, थोहा और बेवाल (1947) की घटनाओं को भयानक और डरावने उदाहरण बताया गया है.
इसके साथ ही मुस्लिम लीग का 'डायरेक्ट एक्शन डे' (अगस्त 1946) को एक निर्णायक मोड़ कहा गया है. उस समय जिन्ना ने चेतावनी दी थी, "या तो एक बंटा हुआ भारत या एक बर्बाद भारत." इस दबाव की वजह से कांग्रेस नेताओं को जिनमें नेहरू और पटेल शामिल हैं, को झुकना पड़ा और बंटवारे के लिए राजी होना पड़ा.
मॉड्यूल में यह भी बताया गया है कि ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख को जून 1948 से घटाकर अगस्त 1947 कर दिया. जिसे NCERT ने एक बड़ी लापरवाही बताया है, क्योंकि इस जल्दबाजी में लाखों लोगों को यह तक नहीं पता था कि वे आजादी के बाद किस देश में रह गए हैं.
सेकेंड्रीय स्टेज का मॉड्यूल में यह भी बताया गया है कि भारत आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है, जैसे- कश्मीर विवाद, सांप्रदायिक राजनीति और भारत की विदेश नीति पर बाहरी दबाव. ये सब बंटवारे का ही नतीजा हैं. इसमें यह भी लिखा गया है कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए तीन युद्ध छेड़े और हारने के बाद जिहादी आतंकवाद को बढ़ावा देना शुरू कर दिया.
मॉड्यूल में एक दिलचस्प तथ्य का भी जिक्र किया गया है, इसमें कहा गया है कि खुद मोहम्मद अली जिन्ना को भी उम्मीद नहीं थी कि पाकिस्तान उनके जिंदगी में बन जाएगा. उन्होंने कहा था, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा. मैंने अपने जीवनकाल में पाकिस्तान को देखने की कभी उम्मीद नहीं की थी."
मॉड्यूल का अंत एक गहरी सीख के साथ होता है। इसमें कहा गया है कि "शासकों की दूरदर्शिता की कमी एक राष्ट्रीय आपदा बन सकती है. शांति पाने के लिए अगर हम हिंसा करने वालों को रियायत देते हैं, तो उनकी भूख और बढ़ जाती है." साथ ही यह जोर दिया गया है कि बंटवारे की भयावहता को याद रखना तभी जरूरी है जब हम इससे सबक लें, सांप्रदायिक राजनीति को नकारें और ऐसा नेतृत्व चुनें जो देशहित को सबसे ऊपर रखे, न कि पार्टी या व्यक्तिगत हितों को.
NCERT के विभाजन पर तैयार किए मॉड्यूल को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं, इसकी वजह है कि कट्टरपंथी संगठन 'हिंदू महासभा' का विभाजन के लिए जिम्मेदार न ठहराना. भारत के विभाजन को लेकर ऐतिहासिक दस्तावेज और शोधों की एक श्रृंखला हिंदू महासभा की भी अहम भूमिका की ओर इशारा करती है.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदू महासभा और उसके प्रमुख नेताओं की सोच ने भारत के बंटवारे के विचार को जन्म देने और बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई. इतिहासकार आर.सी. मजूमदार और ए.के. मजूमदार ने Struggle for Freedom (1969) में साफ तौर पर लिखा कि 'भारत के धार्मिक आधार पर विभाजन की कल्पना के पीछे जो एक सबसे बड़ी वजह थी, वह थी हिंदू महासभा."
विनायक दामोदर सावरकर, जो आरएसएस और हिंदुत्व विचारधारा के प्रमुख विचारक माने जाते हैं, ने 1923 में प्रकाशित अपनी किताब हिंदुत्व में 'टू नेशन थ्योरी' का विचार रखा था. जिन्ना के इस सिद्धांत को अपनाने से 16 साल पहले, सावरकर का यह सिद्धांत भारतीय उपमहाद्वीप को हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्रों के रूप में देखता था.
इतना ही नहीं हिंदू महासभा स जुड़े लाला लाजपत राय ने भी 14 दिसंबर 1924 को The Tribune में लिखा, "मेरे प्रस्ताव के मुताबिक मुसलमानों को चार मुस्लिम राज्य मिलेंगे. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, पश्चिमी पंजाब, सिंध और पूर्वी बंगाल. अगर भारत के अन्य हिस्सों में मुस्लिम समुदाय पर्याप्त संख्या में और संगठित हैं तो उन्हें भी इसी तरह एक प्रांत के रूप में गठित किया जा सकता है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि यह एक एकीकृत भारत नहीं होगा. इसका अर्थ है भारत का स्पष्ट विभाजन,मुस्लिम भारत और गैर-मुस्लिम भारत."
यह कथन 1940 में मुस्लिम लीग के जरिये लाहौर प्रस्ताव पास किए जाने से ठीक 16 साल पहले पेश किया गया था. इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि हिंदू महासभा और कांग्रेस के कुछ प्रभावशाली नेताओं के भीतर यह सोच पहले से मौजूद थी कि हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए भारत का विभाजन एक स्वीकार्य विकल्प हो सकता है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी पार्टी बनाने वाले मदन मोहन मालवीय और लाजपत राय जैसे नेताओं की सोच भी इसी ओर इशारा करती है.
इन ऐतिहासिक तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारत विभाजन की जमीन सिर्फ जिन्ना और मुस्लिम लीग ने ही नहीं बनाई बल्कि हिंदू महासभा और उसके प्रमुख विचारकों ने भी अलगाव की विचारधारा को हवा दी. इस वैचारिक समर्थन ने बाद में चलकर विभाजन की मांग को और मजबूती दी. एक्सपर्ट का कहना है कि NCERT को विभाजन पर चर्चा करते समय इन पक्षों की भूमिका को भी समझना जरूरी है, ताकि इतिहास की पूरी तस्वीर सामने आ सके.