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Maharashtra News Today: महाराष्ट्र समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के एक बार फिर अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में है. उनके बयान ने न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश में सियासी तूफान खड़ा कर दिया है. दरअसल, अबू आजमी ने दावा किया है कि "मदरसों के लोगों ने ही सबसे पहले महात्मा गांधी को 'गांधीजी' की उपाधि दी थी." उनके इस बयान पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है.
प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा कि, "गांधीजी के पिता का नाम करमचंद गांधी था. पिता से पुत्र को 'गांधी' सरनेम मिला. ये तो स्कूल में पांचवीं क्लास के बच्चे को भी पढ़ाया जाता है. यह बात सबको पता है. इसलिए बच्चों को स्कूल भेजो, ताकि बड़े होकर अबू आजमी जैसी बातें न करें."
कानूनगो ने आगे लिखा कि, "याद रहे, खिलाफत मूवमेंट का असली मकसद था तुर्की के इस्लामिक खलीफे का साम्राज्य बचाना." उन्होंने अबू आजमी के बयान को ऐतिहासिक तथ्यों से परे बताया और कहा कि इतिहास को इस तरह से तोड़-मरोड़कर पेश नहीं किया जाना चाहिए.
दरअसल, अबू आजमी ने आईएएनएस से बातचीत में कहा था कि "मदरसों के लोगों ने ही सबसे पहले महात्मा गांधी को 'गांधीजी' की उपाधि दी थी. जब गांधी जी बंबई आए, तो मदरसों के लोगों ने खिलाफत भवन में उनका स्वागत किया और स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग के लिए जो भी धन उनके पास था, वह दान कर दिया."
समाजवादी पार्टी के सीनियर नेता अबू आजमी ने कहा कि "मदरसा समुदाय ने हमेशा इस देश से प्यार किया है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हजारों मदरसा विद्वानों ने देश के लिए शहादत दी थी." अबू आजमी ने इस दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि "ये लोग सिर्फ नफरत की सियासत करते हैं. इसके अलावा इन लोगों को कुछ नहीं आता है."
गौरतलब है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कुछ दिनों पहले एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि "बिहार ही नहीं, पूरे देश में मदरसे बंद होने चाहिए. हमें सेना में जाने वाले, वैज्ञानिक, डॉक्टर और इंजीनियर चाहिए. हमें ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो देश को नुकसान पहुंचाते हैं." हिमंता बिस्वा सरमा लगातार मुस्लिम समुदाय को लेकर विवादित बयान देते रहे हैं.
अबू आजमी के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर सियासी घमासान मचा हुआ है. एक ओर जहां प्रियंक कानूनगो ने उन्हें इतिहास पढ़ने की सलाह दी, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के कुछ समर्थक उनके बचाव में उतर आए हैं. फिलहाल इस बयान ने धार्मिक और सियासी दोनों ही हलकों में नई बहस छेड़ दी है. यह मामला बिहार चुनाव में तूल पकड़ सकता है.