PM Modi in Jahan E Khusrau: पीएम मोदी ने बीते रोज सुंदर नर्सरी में जहान-ए-खुसरो के 25वें एडिशन में हिस्सा लिया. उन्होंने इस दौरान कुरान, नमाजस खानकाह और सूफी संतो पर अपनी बात रखी.
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PM Modi in Jahan E Khusrau: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीती शाम जहान-ए-खुसरो में शिरकत की. इस दौरान उन्होंने लोगों से खिताब भी किया और सूफि संस्कृति की जमकर तारीफ की. पीएम मोदी ने कुरान और वेदों में दिए गए संदेश का जिक्र करते हुए कहा कि भाषाएं अलग-अलग है, लेकिन मैसेज एक ही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "भारत में सूफी परंपरा ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। सूफी संतों ने खुद को मस्जिद और खानकाहों तक सीमित नहीं रखा है। उन्होंने पवित्र कुरान के हर्फ पढ़े तो वेदों के शब्द भी सुने, उन्होंने अज़ान की सदा में भक्ति के गीतों की मिठास को जोड़ा."
पीएम आगे कहते हैं इसलिए उपनिषद जिसे संस्कृत में 'एकम सत्यम विप्रा बहुधा वदन्ति' कहते हैं, हजरत निजामुद्दीन औलिया ने कही. अलग-अलग भाषा, शैली लेकिन संदेश वही है. किसी भी देश की सभ्यता, उसकी तहजीब स्वर, गीत और संगीत से मिलती है. उसकी अभिव्यक्ति कला से होती है.
WATCH प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "भारत में सूफी परंपरा ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। सूफी संतों ने खुद को मस्जिद और खानकाहों तक सीमित नहीं रखा है। उन्होंने पवित्र कुरान के हर्फ पढ़े तो वेदों के शब्द भी सुने, उन्होंने अज़ान की सदा में भक्ति के गीतों की मिठास को जोड़ा... किसी… pic.twitter.com/7tO6vBgnsj
— ANI_HindiNews (@AHindinews) February 28, 2025
पीएम मोदी आगे कहते हैं हजरत खुसरो कहते थे कि भारत के संगीत में एक सम्मोहन है. पीएम मोदी ने बीते रोज दिल्ली के सुंदर नर्सरी में जहान-ए-खुसरो के 25वें एडिशन में हिस्सा लिया था. उन्होंने इस समारोह को "हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबू" से सराबोर बताया.
ख़ुसरो ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और कव्वाली में स्थायी योगदान दिया है और उन्हें आधुनिक हिंदी और उर्दू की पूर्ववर्ती हिंदवी को विकसित करने का श्रेय भी दिया जाता है. ख़ुसरो के बारे में जो कुछ भी जाना जाता है, वह उनके अपने लिखे हुए से आता है. ख़ुसरो के पिता 13वीं शताब्दी की शुरुआत में मध्य एशिया से भारत आए थे, जब चंगेज खान के मंगोल गिरोह ने इस्लामिक ट्रांसऑक्सियाना (कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, उज़बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के कुछ हिस्सों) को तबाह कर दिया था.
उन्होंने सुल्तान इल्तुतमिश (1211-36) के जमाने में हिंदुस्तान में एंट्री की थी. कुछ वक्त यहां रहने के बाद उन्होंने एक भारतीय मुस्लिम की बेटी से शादी की. दंपति के दूसरे बच्चे, अबुल हसन यामिन उद-दीन ख़ुसरो का जन्म 1253 में हुआ था. ख़ुसरो को अपने वंश के दोनों पक्षों पर गर्व था और उनका जीवन और लेखन दो अलग-अलग संस्कृतियों के संश्लेषण का प्रतीक है।" कवि अक्सर खुद को "भारतीय तुर्क" कहते थे.