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Uttar Pradesh News Today: देशभर में अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों को लेकर चर्चाएं तेज हैं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश की पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए उस एफआईआर को रद्द कर दिया, जिसे एक मुस्लिम शख्स ने दायर की थी और वह एक पुलिस अधिकारी की कथित ऑडियो क्लिप की जांच करवाने की कोशिश की गई. इस बात से नाराज पुलिस ने पीड़ित के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली. इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस ने अपने अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया.
पीड़ित शख्स इस्लामुद्दीन अंसारी पर इस मामले में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में आपराधिक केस दर्ज हुआ था. यह केस COVID-19 महामारी के दौरान दर्ज हुआ था. आरोप यह था कि बिजनौर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की एक कथित ऑडियो क्लिप में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी सुनाई दे रही थी. याचिकाकर्ता इस्लामुद्दीन अंसारी ने यह ऑडियो क्लिप खुद उसी समय के एसपी को भेजकर पुष्टि करने को कहा था कि क्या इसमें उनकी ही आवाज है.
याचिकाकर्ता पर ही पुलिस ने दर्ज कर लिया केस
याचिकाकर्ता इस्लामुद्दीन अंसारी के मुताबिक, उनका मकसद सिर्फ यह जानना था कि ऑडियो सही है या फेक ताकि आगे कोई कानूनी कदम उठाया जा सके. लेकिन इसके बाद उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 505 और आईटी एक्ट की धारा 67 में कथित तौर पर अफवाह फैलाने व साम्प्रदायिक भावना भड़काने के आरोप में एफआईआर दर्ज कर ली गई. 2021 में इस केस में चार्जशीट दाखिल हुई और मजिस्ट्रेट ने संज्ञान भी ले लिया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केस रद्द करने की मांग खारिज की तो याचिकाकर्ता इस्लामुद्दीन अंसारी ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच के सामने रखा गया. पिछले शुक्रवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछे और कहा कि बिना ऑडियो की जांच किए एफआईआर दर्ज करना न्यायिक अधिकारों का गलत इस्तेमाल है.
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि पुलिस जांच अधिकारी ने न तो ऑडियो की जांच कराई और न ही उस अधिकारी से वॉयस वेरिफिकेशन कराया, जिन पर शक था. सोमवार को राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने केस वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि वह इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते. इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि शुरू में ही यह एफआईआर कैसे मेंटेन हो सकती थी?
SC ने DIG बस्ती और तेलंगाना FSL को बनाया पार्टी
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन एसपी बिजनौर संजीव त्यागी (वर्तमान में DIG, बस्ती रेंज) को भी मामले का पक्षकार बनाया और निर्देश दिया कि वे ऑडियो क्लिप के वेरिफिकेशन के लिए तेलंगाना की स्टेट FSL लैब में अपना वॉयस सैंपल दें. कोर्ट ने साफ कहा, "अगर ऑडियो में इस्तेमाल शब्द उनके हैं, तो उन्हें सिस्टम के प्रति जवाबदेह होना होगा."
कोर्ट ने तेलंगाना स्टेट FSL को भी पार्टी बनाते हुए उसके डायरेक्टर को निर्देश दिया कि वेरिफिकेशन उनकी निगरानी में हो और यह प्रक्रिया किसी दबाव से प्रभावित न हो. रिपोर्ट 31 जनवरी 2026 तक सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में जमा की जानी होगी. इस मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी को दोपहर 3:30 बजे निर्धारित की गई है. आखिर में कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जांच के दौरान याचिकाकर्ता को अधिकारियों के जरिये परेशान किया गया तो वे सीधे सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दे सकते हैं.