UAPA conviction rate India: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत अर्जी खारिज कर दी. वह, बीते पांच सालों से जेल में बंद हैं और उनकी अर्जी खारिज होने के बाद देशभर में एक बार फिर UAPA के तहत हुई गिरफ्तारियों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में भी UAPA और PSA के तहत बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन सजा की दर बेहद कम रही. आइये समझते हैं इन गिरफ्तारियों को सिलसिलेवार ढंग से, जिसको लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम न्याय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
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साल 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा, आतंकवाद और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार ने 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाने का दावा किया. सरकार का कहना रहा कि सख्ती से हालात काबू में आएंगे. लेकिन जैसे-जैसे आधिकारिक आंकड़े सामने आते गए, वैसे-वैसे यह सवाल गहराता गया कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इंसाफ की बुनियादी प्रक्रिया कमजोर होती जा रही है. सोमवार (5 जनवरी) को यह मामला तब और तूल पकड़ने लगा जब देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने 2020 दिल्ली दंगों के आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिका को खारिज कर दिया.
इससे पहले पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) प्रमुख और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जेल में कैद नौजवानों को लेकर चिंता जताई है, जो लंबे समय से बगैर ट्रायल जेल में बंद हैं और इंसाफ की राह देख रहे हैं. उनका कहना है कि 2019 से अब तक सैकड़ों कश्मीरी नौजवान जेलों में बंद हैं. इनमें से बड़ी संख्या ऐसे नौजवानों की है जो अंडरट्रायल हैं और जिनका मुकदमा अभी तक शुरू भी नहीं हुआ है. महबूबा मुफ्ती के मुताबिक यह सिर्फ एक सियासी बयान नहीं, बल्कि आंकड़ों से जुड़ा गंभीर सवाल है.
अगर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के आंकड़ों पर गौर करें, तो जम्मू-कश्मीर की स्थिति देश के बाकी हिस्सों से अलग नजर आती है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2023 के बीच देशभर में UAPA के तहत कुल 10,440 गिरफ्तारियां हुईं. इनमें से अकेले जम्मू-कश्मीर में 3,662 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं. साल-दर-साल आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ होती है. उनमें से कई लोग अभी भी बगैर ट्रायल के सलाखों के पीछे हैं.
UAPA के तहत साल दर साल गिरफ्तारियां
शरजील इमाम और उमर खालिद से पहले बड़ी संख्या में UAPA के तहत गिरफ्तारिया हो चुकी हैं. महज 2019 में देशभर में UAPA के तहत 1,948 गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें जम्मू-कश्मीर से 227 मामले सामने आए. इसी तरह 2020 में देश में 1,321 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह संख्या 346 रही. 2021 में देश में 1,621 गिरफ्तारियां हुईं और जम्मू-कश्मीर में 645 लोगों को UAPA के तहत पकड़ा गया. 2022 में देशभर में 2,636 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं, जिनमें जम्मू-कश्मीर से 1,238 मामले थे. 2023 में देश में 2,914 गिरफ्तारियां हुईं, जबकि जम्मू-कश्मीर में 1,206 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं.
इन आंकड़ों के आधार पर देखा जाए तो 2019 से 2023 के बीच देश की कुल UAPA गिरफ्तारियों का लगभग 42 फीसदी अकेले जम्मू-कश्मीर से हुआ. साल दर साल तस्वीर बदलती रही, लेकिन गिरफ्तारियों का सिलसिला नहीं रुका. सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आता है कि पूरे देश में UAPA के तहत अब तक सिर्फ 23 लोगों को ही सजा मिल पाई है. बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां होने के बावजूद सजा का आंकड़ा बेहद कम है, जबकि हजारों लोग अब भी अंडरट्रायल के तौर पर जेलों में बंद हैं.
गिरफ्तारियों के मुकबाले सजा की दर बहुत कम
देशभर में गिरफ्तारियां हजारों में हैं और सजा गिनती की हुई. मतलब साफ है कि या तो ट्रायल शुरु नहीं हुआ, या हुआ तो कोर्ट से ज्यादातर बरी हो गए, इसके अलावा दूसरा कुछ इसका मतलब निकाला नहीं जा लकता. अब अंडरट्रायल की सच्चाई देखिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कह चुके हैं कि देश की जेलों में 3.5 लाख अंडरट्रायल हैं. कुल कैदियों का 76 फीसदी हिस्सा अंडरट्रायल है.
महबूबा मुफ्ती के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में UAPA के तहत जेल में बंद कश्मीरी नौजवानों की संख्या लगातार बढ़ी है. उनका कहना है कि इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिनके मामलों में अब तक ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ है. सालों तक बिना सुनवाई जेल में बंद रहना गंभीर सवाल खड़े करता है. भारत का संविधान, खासतौर पर अनुच्छेद 21, हर नागरिक को तेज और निष्पक्ष न्याय का अधिकार देता है. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना सजा और बिना ट्रायल के सालों तक जेल में रहना क्या संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं है.
अगर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स (MHA) के 2023 से 2025 तक के हालिया आंकड़ों पर नजर डालें, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है. इन आंकड़ों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में कुल अपराधों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है. डेटा यह भी बताता है कि हत्या की दर के मामले में जम्मू-कश्मीर देश के सबसे निचले स्तर वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल रहा है.
इसी तरह महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के खिलाफ अपराध भी कई बड़े राज्यों की तुलना में कम दर्ज किए गए हैं. हालांकि, साइबर अपराधों में बढ़ोतरी जरूर देखी गई है, लेकिन यह बढ़ोतरी सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है. यह रुझान पूरे देश में देखने को मिला है, जो डिजिटल अपराधों के बढ़ते खतरे की ओर इशारा करता है.
जब आधिकारिक आंकड़े यह बताते हैं कि छोटे और पारंपरिक अपराधों में कमी आई है, तो फिर देश-विरोधी और आतंकी मामलों की संख्या में बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठना लाजमी है. सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और गिरफ्तारियों के आंकड़े यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि
क्या किसी एक इलाके या समुदाय को व्यापक रूप से संदेह के दायरे में रखा जा रहा है.
यह सच है कि यह मान लेना भी गलत होगा कि हर गिरफ्तार व्यक्ति निर्दोष है, लेकिन उतना ही अहम सवाल यह भी है कि क्या हर गिरफ्तारी अपने-आप में आतंकवाद साबित करती है? कानून का मूल मकसद सजा देना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित करना होता है. इनमें से कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां सालों तक ट्रायल शुरू नहीं हो पाया. ई. राशिद, यासीन मलिक और मेहराज मलिक जैसे चर्चित नाम हों या फिर सैकड़ों गुमनाम कश्मीरी नौजवान. कई लोग लंबे समय से जेल में बंद हैं, बिना सुनवाई और बिना किसी अंतिम फैसले के.
इन मामलों ने न्याय प्रक्रिया की गति और उसकी दिशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर जिन मामलों में वर्षों तक फैसला नहीं होता, उनमें आरोपी और उनका भविष्य किस अनिश्चितता में जीने को मजबूर होता है. यही सवाल अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है.
UAPA की तरह इन कानूनों का भी हो रहा विरोध
UAPA की तरह भारत में कुछ ऐसे कानून और धाराएं हैं जिनका मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखना है, लेकिन समय-समय पर इनके अंधाधुंध या गलत इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं.
1️. IPC Section 124A- (Sedition)
सरकार की आलोचना को 'राजद्रोह' बताकर केस दर्ज होता है. साल 2022 में सर्वोच्च न्यायालय के जरिये इस कानून पर रोक लगा दी गई फिर भी पुराने मामलों में लोग सलाखों के पीछे हैं.
2️. IPC 153A & 295A
153A धर्म, जाति या समुदायों में दुश्मनी फैलाने का आरोप ईसके तेहत आते है. 295A धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगता है या भाषण, लेख, पोस्ट या सोशल मीडिया पर अक्सर लगाई जाती हैं.
3️. NSA National Security Act
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जिसमें बिना मुकदमे के लंबे समय तक महज शक की बुनियाद पर जांच एजेंसियों और पुलिस को हिरासत में रखने का अधिकार देता है. जमानत मिलना बहुत कठिन है कई बार सामान्य कानून-व्यवस्था के मामलों में भी इस्तेमाल होता है.
4️. PMLA Prevention of Money Laundering Act
धन शोधन निवारण अधिनियम यानी ED को बहुत अधिक शक्तियां दी गई हैं. ज़मानत लगभग असंभव होता है. विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के मामलों में दुरुपयोग का आरोप लगते रहै है. इस को लेकर अक्सर केंद्र सरकार पर विपक्षी नेताओं को परेशान करने और उनको परेशान करने के आरोप लगते रहे हैं.
5️. IT Act Sections (jaise 69A, 43B)
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम Act जिसमें ऑनलाइन सामग्री, वेबसाइट और अकाउंट ब्लॉक करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर धारा 66A को 2015 में रद्द किया गया, फिर भी गलत तरीके से लगाने की घटनाएं सामने आईं हैं.
6️. CrPC Section 144
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 सभा, धरना और प्रदर्शन पर रोक लगाने के लिये है लंबे समय तक लागू करना या दुरुपयोग का आरोप है.
7. AFSPA
सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) कुछ राज्यों में सेना को विशेष अधिकार देता है. इसमें मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप हैं. इसको कानून पर रोक लगाने के लिए कई मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लंबे समय तक विरोध किया, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है.
8️. Public Safety Act PSA
जम्मू-कश्मीर में लागू है. इसमें भी बिना मुकदमे लंबी हिरासत का अधिकार जांच एजेंसियों और पुलिस को मिला है. आम आदमी पार्टी के जम्मू कश्मीर में एक मात्र विधायक मेहराज मलिक भी अभी इसी सिलसिले में जेल में हैं. खास बात यह है कि सरकार के मुताबिक, ये कानून देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है. जबकि आलोचक कहते हैं कि इनका इस्तेमाल असहमति और विरोध की आवाज दबाने के लिए होता है.
राजनीतिक दलों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. चुनाव से पहले वादे किये गये इनको जेल से बाहर लाने के लिये, लेकिन सत्ता में आने के बाद चुप्पी साध ली गई. संसद और विधानसभा में मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया, क्योंकि जनता के अधिकार अक्सर राजनीतिक खींचतान की बलि चढ़ जाते हैं.
असली सवाल क्या है?
अगर खतरा इतना बड़ा है, तो सजा की दर इतनी कम क्यों है? ट्रायल इतने धीमे क्यों रहती है? पारदर्शी डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं होते? सुरक्षा और न्याय एकदूसरे के दुश्मन नहीं हो सकते. कानून का मकसद डर पैदा करना नहीं है, बल्कि दोषी को सजा और निर्दोष को राहत देना होता है.
आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
इस सवाल से अब बचना मुश्किल हो गया है. जब देश की सुरक्षा और नागरिकों के अधिकार आमने-सामने खड़े दिखाई दें, तो समाधान सिर्फ सख्त कानून नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण प्रक्रिया से निकलता है. पहला जरूरी कदम यह हो सकता है कि UAPA और PSA जैसे कड़े कानूनों के मामलों में समयबद्ध ट्रायल को अनिवार्य बनाया जाए. किसी भी शख्स को सालों तक बिना सुनवाई जेल में रखना, न्याय की मूल भावना के विपरीत है.
दूसरा, अहम सुझाव स्वतंत्र और निष्पक्ष रिव्यू कमेटियों का गठन है. इन समितियों में रिटायर्ड जज, वरिष्ठ वकील और कानूनी विशेषज्ञ शामिल हों, जो यह जांचें कि किस मामले में कानून का सही इस्तेमाल हुआ है और कहां अंधाधुंध कार्रवाई की गई. तीसरा, रास्ता लंबे समय से बंद अंडरट्रायल कैदियों के लिए स्पष्ट जमानत नीति बनाना हो सकता है. अगर जांच पूरी हो चुकी है और ट्रायल शुरू नहीं हुआ, तो जेल को सजा का विकल्प नहीं बनने दिया जाना चाहिए.
चौथा जरूरी कदम यह है कि कश्मीर के कैदियों का पूरा डेटा, खासकर जो राज्य से बाहर की जेलों में बंद हैं, सार्वजनिक किया जाए. पारदर्शिता ही भरोसे की पहली शर्त होती है. और सबसे अहम बात, राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय होनी चाहिए. सिर्फ बयानबाजी से नहीं, बल्कि ठोस कानूनी और प्रशासनिक कदमों से. क्योंकि देश की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन न्याय के बिना सुरक्षा कभी भरोसा पैदा नहीं कर सकती है.
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