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UP News: उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार 11 मुस्लिम युवकों को हाईकोर्ट द्वारा दी गई ज़मानत को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यूपी सरकार इस मामले में गंभीर नहीं है, वरना याचिका इतनी देरी से दायर नहीं की जाती.
क्या है मामला?
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों से गिरफ्तार किए गए 11 मुस्लिम युवकों पर अल-कायदा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े होने का आरोप था. उनके खिलाफ यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत मामला दर्ज किया गया था लेकिन जब जांच एजेंसी ने 90 दिनों के अंदर चार्जशीट दाखिल नहीं की और निचली अदालत ने बिना सुनवाई के जांच का समय बढ़ा दिया, तो लखनऊ हाईकोर्ट ने आरोपियों को डिफ़ॉल्ट ज़मानत दे दी.
यूपी सरकार की देरी बनी बड़ी भूल
उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को करीब डेढ़ साल बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जबकि कानून के मुताबिक ऐसे मामलों में 90 दिनों के अंदर अपील की जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी को गंभीरता से लिया और कहा, "अगर सरकार को ज़मानत से कोई समस्या थी, तो उसने समय पर याचिका क्यों नहीं दायर की?"
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमएम सुंदरेश ने साफ़ तौर पर कहा कि हाईकोर्ट का फ़ैसला विस्तार से दिया गया है और उसमें कोई गलती नहीं है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले की समीक्षा नहीं करेगा.
आरोपियों की ओर से क्या कहा गया?
सीनियर वकील गौरव अग्रवाल ने आरोपियों की ओर से दलील दी कि सभी युवक हाईकोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं और उनके ख़िलाफ़ अब तक कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं की गई है. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि यूपी सरकार की याचिका क़ानूनी तौर पर मान्य नहीं है क्योंकि यह बहुत देर से दायर की गई थी.
इन युवकों को मिली राहत
मुहम्मद अलीम, नवाजिश अंसारी, लुकमान, मुदस्सर, मुख्तार, नदीम, हबीबुल इस्लाम, हारिस, आस मुहम्मद, कारी शहजाद और अली नूर को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई है. इन सभी पर एक आतंकवादी संगठन से जुड़े होने का आरोप था. वहीं, इस सुनवाई में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड चांद कुरैशी, शाहिद नदीम, आरिफ अली, मुजाहिद अहमद और अन्य वकील मौजूद थे, जिन्होंने मिलकर आरोपियों की ओर से पैरवी की.