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Assam News Today: असम की हिमंता सरकार अपने कामों को लेकर लगातार विवादों में है. अब असम सरकार के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने भी हैरानी जताई है. असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के अंतिम प्रकाशन और उसके लागू होने के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल बाद भी नागरिकों को पहचान पत्र न मिलने पर नाराजगी जताई है.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एस.एम. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंडूरकर की बेंच ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) और ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) की तरफ से दायर याचिकाओं पर सुनवाई की. सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और इंद्रजीत सिंह ने JUH और AAMSU की तरफ से पेश होकर पक्ष रखा. दोनों सीनियर वकीलों ने कोर्ट को बताया कि NRC की अंतिम सूची प्रकाशित हुए 6 साल बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक लोगों के पहचान पत्र जारी नहीं किए गए हैं.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए पहचान पत्र जारी न होने पर हैरानी जताई. कोर्ट ने केंद्र सरकार, असम सरकार, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और उसके निदेशक को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब मांगा है. मामले की सुनवाई की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ हिचकिचाहट दिखाई और याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने की सलाह दी थी. लेकिन जब अदालत को बताया गया कि इस मामले में केंद्र सरकार और NRC सीधे पक्षकार हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति दे दी.
गौरतलब है कि असम में NRC की पूरी प्रक्रिया 2013 से 2019 तक सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूरी की गई थी. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और स्टेट कोऑर्डिनेटर के जरिये संयुक्त रूप से अंतिम NRC लिस्ट प्रकाशित की गई, जिसमें 3 करोड़ 30 लाख आवेदनों की सूक्ष्म जांच की गई थी. इसका मुख्य उद्देश्य असम में दशकों पुराने नागरिकता विवाद का संवैधानिक और कानूनी समाधान करना था.
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह भी मांग की गई है कि जिन 3.11 करोड़ पात्र नागरिकों का नाम NRC में शामिल किया गया है, उन्हें बिना देरी के राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किया जाए. साथ ही जिन 19 लाख लोगों के नाम खारिज किए गए हैं, उन्हें तुरंत आधिकारिक अस्वीकृति पर्ची (रिजेक्शन स्लिप) दी जाए, ताकि वे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील कर सकें. याचिका में यह भी कहा गया है कि NRC की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में वैज्ञानिक, डेटा आधारित और प्रमाणों की जांच पर आधारित रही है, इसलिए इसे कानून के तहत पूर्ण रूप से लागू किया जाए और अधूरा न छोड़ा जाए.
याचिका में कहा गया है कि अधिकारियों की यह लापरवाही NRC प्रक्रिया को अधूरा, असंवैधानिक और मनमाना बना देती है. यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है. अंतिम NRC के बाद इसे ऐसे ही रोक देना लाखों नागरिकों को अनिश्चित नागरिकता की स्थिति में छोड़ देता है, जिससे समाज में भय, अविश्वास और सामाजिक विभाजन बढ़ रहा है.
वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अदालत के कदम को उम्मीद जगाने वाला बताया है. उन्होंने कहा कि असम में सांप्रदायिक ताकतें मुसलमानों को विदेशी बताकर उनकी पहचान पर सवाल उठाती रही हैं, जिससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि पंचायत प्रमाण-पत्र के मुद्दे, नागरिकता की कट-ऑफ तारीख तय करने या मदरसों को बंद करने की कथित साजिश जैसे मामलों में जमीयत उलेमा-ए-हिंद हर बार पीड़ितों के साथ मजबूती से खड़ी रही है और उनके मामलों की प्रभावी पैरवी करती आई है.